Monday, 3 December 2018

कार्य को निष्पादित करे (deliver) & make things happen।

rpmwu161
02.12.2018

एक बार दीवार पर तीन बिल्लियां बैठी हुई थी, उनमें से दो ने निर्णय लिया कि कूद जाएं। अब कितनी बिल्लियां बची? साधारणतया लोग कहेंगे कि "एक" परंतु 1 घंटे या कई दिनों बाद देखा गया कि वहां तीनों ही बिल्लियां बैठी हुई थी। क्योंकि दो बिल्लियों ने केवल निर्णय ही लिया था, लिए गये निर्णय का क्रियान्वयन नहीं किया।
यह कहानी जीवन के हर पहलू पर लागू होती है। निर्णय लेना एक बात है परंतु उसे क्रियान्वित करना बहुत ही जरूरी है। अर्थात कार्य को कर दिया जाए "make things happen" यथा delivery बहुत जरूरी है।
प्रतिदिन हम लोग अपने घर पर सुबह देख सकते है कि मां या पत्नी नाश्ता तैयार करके दे देती है। मसलन उन्होंने आटा, चावल, बेसन या ब्रेड इत्यादि ली और उसको प्रोसेस करके एंड रिजल्ट नाश्ते या खाने के रूप में तैयार कर देती हैं। कुल मिलाकर सुबह श्याम यदि घर पर महिलाओं के रोल को देखें तो उसमें कार्य निष्पादन के बहुत सारे पहलू जुड़े रहते हैं। इसी प्रकार हर व्यक्ति सुबह उठकर स्नान कर लेता है तो उसने एक कार्य निष्पादित कर लिया। यदि एक्सरसाइज कर ली तो एक और मुख्य कार्य निष्पादित कर लिया।
दिन भर में देखने की आवश्यकता है कि व्यक्ति वास्तव में क्या कार्य निष्पादित करता है? कार्यालय में डिसीजन लेना, फाइलों को निपटाना भी कार्य निष्पादन करना है। हर व्यक्ति को दिन समाप्त होने पर अपने आपको इवेलुएट करना चाहिए कि उसने उस दिन क्या कार्य निष्पादित किया है? यदि उसे लगे कि वह एफिशिएंट तरीके से कार्य निष्पादित नहीं कर पा रहा है तो उसे कार्य करने के तरीके बदलाव करने की जरूरत है।
कार्य निष्पादन करना जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है। यदि कोई व्यक्ति केवल बातें करें एवं सोचता रहे तो उसका उतना महत्व नहीं है जितना कि कार्य निष्पादन करने का। जब तक हम कार्य निष्पादन नहीं करेंगे तब तक कोई ठोस कार्य संपन्न नहीं होगा। हमें प्रतिदिन देखना चाहिए कि हम कितने अच्छी तरीके से कार्यों को निष्पादित कर रहे हैं या कार्यशैली को और सुधारने की जरूरत है।
"Make Things Happen"
रघुवीर प्रसाद मीना

Sunday, 2 December 2018

यदि मजबूत लोकतांत्रिक ढांचा चाहिए तो चुनाव में नहीं ले किसी भी नेता से कोई अहसान ।

rpmwu160
02.12.2018

राजस्थान में विधानसभा के चुनाव 7 दिसंबर को होने वाले हैं। लोकतंत्र में चुनाव में मत देना एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है। इस दौरान छोटी सोच रखने वाले मतदाता, उनके मत की वैल्यू समझे बिना नेताओं से विभिन्न प्रकार की लालच (फेवर/एहसान) जैसे गाड़ी का किराया, कुछ पैसे, शराब या कपड़े इत्यादि लेकर अपने मत की कीमत पर कलंक लगा लेते हैं। जिस नेता ने ऐसी लालच से वोट लिए हैं वह उन मतदाताओं की अगले 5 साल बिल्कुल परवाह नहीं करता है क्योंकि उसने इन वोटों को खरीदा है ना कि लोगों ने उसके ऊपर किसी प्रकार का कोई एहसान किया है।
यदि हम वास्तव में चाहते हैं कि अच्छे नेता चुने जाये तो हमें चाहिए कि चुनाव के समय नेताओं से किसी प्रकार का फेवर या एहसान नहीं ले, बल्कि मत देकर आप अच्छा नेता और सरकार चुन कर लोकतंत्र की मदद करें। ऐसा करने से नेता हमेशा हमेशा के लिए आप का कृतज्ञ रहेगा और जैसा वोटर चाहेंगे वह उसी प्रकार का कार्य करेगा। यदि कोई व्यक्ति लालच लेकर वोट दे रहा है तो उसको उस नेता से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए।
इस संदर्भ में एक बड़ा जोरदार उदाहरण मैंने अभी हाल में पढ़ा है। एक व्यक्ति के पास एक नेता गया और उसने उसे ₹1000 का नोट दिया और कहा कि आप मुझे वोट देना। उस समझदार व्यक्ति ने कहा कि भाई ₹1000 का मैं क्या करूंगा कि आप एक काम करो मेरे लिए एक गधा खरीद कर दे दो। जब वह नेता गधा खरीदने के लिए बाजार में गया तो पता लगा कि ₹20000 तक में भी गधा नहीं आ रहा है, तो उसने सोचा कि अगर ऐसे मैं गधा देता रहूंगा तो यह बहुत ही मंहगा पड़ेगा। तो वह नेता उस व्यक्ति के पास पुन: गया, उसने कहा कि गधे तो बहुत महंगे हैं ₹20000 से कम नहीं मिल रहे है तो उस व्यक्ति ने कहा तो मैं क्या तुमको गधे से भी बेवकूफ नजर आ रहा हूं? जो आप मेरे बोट को हजार रुपे में खरीदना चाहते हो ।
इस छोटी सी कहानी के माध्यम से हम सब को यह समझना चाहिए कि हमारा वोट बहुत ही महत्वपूर्ण है। सच्चे लोकतंत्र के लिए उसे किसी भी कीमत पर छोटी -मोटी लालच या फेवर इत्यादि के लिए नहीं बेचे और चुनाव के समय नेताओं से किसी भी प्रकार का फेवर  या एहसान नहीं ले। बल्कि यदि आप करने के लिए सक्षम है तो उन पर एहसान करें ताकि 5 साल तक वे अच्छे मन लगाकर स्वच्छ लोकतंत्र में काम कर सके।
यदि मतदाता भ्रष्ट तरीके अपनाकर वोट देता है तो मान लेना चाहिए कि उसने भ्रष्टाचार का पेड़ लगा दिया है जिसमें भ्रष्टाचार के ही फल आने वाले हैं। और यदि उसने नेकी से मत दिया हैं तो उसने नेकी का पेड़ लगाया हैं जिसमें नेकी के ही फल आने वाले है। हमें समझ लेना चाहिए कि देश, समाज और व्यक्ति स्वयं के विकास और उन्नति के लिए उसे क्या करना है?
रघुवीर प्रसाद मीना

Thursday, 29 November 2018

स्किल बढ़ाने के लिए स्किल का खेलों की तरह कंपटीशन किया जाना चाहिए।

rpmwu159
29.11.2018

हमारे देश की जो सबसे बड़ी समस्याएं है उसमें से लोगों में स्किल की कमी एक प्रमुख समस्या है। कार्य करने के प्रत्येक क्षेत्र में अच्छी स्किल वाले लोगों की भारी कमी होने के कारण भारत में बनने वाले उत्पादों की गुणवत्ता उतनी बेहतर नहीं होती जितनी की विदेशों के उत्पादों की होती है।
देश में स्किल की कमी व्यक्तिगत न होकर एक सामुहिक व सामाजिक समस्या है। क्योंकि चिरकाल से देश में जो लोग हाथ से कार्य करते थे उनको समाज में नीचा दर्जा मिला और जो लोग हाथ से कार्य नहीं करते थे, केवल बातें करते थे, पूजा करते थे, लड़ाई कर सकते थे, मैनेज करते थे और फाइनेंस अरेंज करते थे उन्हें समाजिक तौर पर ऊपर रखा गया और उन्हें ज्यादा महत्व दिया गया। जिसके कारण कालांतर में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ गई जो हाथ से काम नहीं करके, बातें या भाषण देने में माहिर थे या चीजों को मैनेज करते थे। आज भी यदि देखें तो देश में लगभग 80% धन सम्पदा उन लोगों के पास है जो स्वयं कार्य नहीं करते हैं उनमें कोई स्किल नहीं है।
देश की अपेक्षित उन्नति नहीं होने का एक मुख्य कारण देश के उत्पादों व सेवाओं की गुणवत्ता में कमी है। यदि हम वास्तव में देश की त्वरित तरक्की चाहते हैं तो हमें हमारे  उत्पादों और सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार करना होगा और वह तभी संभव है जब काम करने वाले लोगों की स्किल उच्च स्तर की हो।
हमें अच्छी स्किल वाले लोगों का सम्मान करना होगा, उन्हें महत्व देना होगा, लोगों के मन में उनके प्रति आदर जागृत करना होगा। जैसे हम खेलों को बढ़ावा देने के लिए खेलों के विभिन्न प्रकार के कंपटीशन कराते हैं उसी प्रकार यदि स्किल से संबंधित कंपटीशन करवाएं जाएं तो स्किल डेवलपमेंट में मील का पत्थर साबित हो सकते है और देश में बनने वाले उत्पादों की गुणवत्ता में उत्तरोत्तर सुधार होगा। देश के जल्दी विकसित होने व लोगों को रोजगार मिलने में यह ठोस कदम साबित हो सकता है।
समाज व सरकार दोनों को अपने अपने स्तर पर स्किल से सम्बन्धित कंपटीशन करवा कर, अच्छी स्किल वाले लोगों को गौरवान्वित करना चाहिए ताकि और लोग भी उनसे प्रभावित होकर उनके अनुयायी बन सके और अच्छी स्किल होने में गर्व महसूस कर सके।
रघुवीर प्रसाद मीना

जनता की नासमझी और नेताओं की चाल।

rpmwu158
29.11.2018

जनता की कमजोर समझ को नेताओं ने अच्छी तरह पहचान रखा है और विभिन्न प्रकार की बहकावे वाली बातें करके जनता को मूर्ख बनाते रहते हैं। हिंदू मुस्लिम, गाय, मंदिर, हरा भगवा रंग, जाति, धर्म, वर्ण व आरक्षण इत्यादि इत्यादि पर लोगों का ध्यान भटकाया जाता है। जबकि विधालयों में शिक्षा हेतु अच्छी सुविधा ना होना, शिक्षा की फीस का बढ़ना,  किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य नहीं मिल पाना, उर्वरकों की आपूर्ति में ब्लैक मेलिंग होना, पीने योग्य पानी की उपलब्धता नहीं होना,  दूरदराज के क्षेत्रों में अच्छे इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी होना,  गरीबों के पास बचत करने के तरीकों का नहीं होना, बेरोजगारी, स्वास्थ्य की सुविधाओं में कमी, महँगाई, भ्रष्टाचार इत्यादि जो वास्तविक मुद्दे हैं, जिनके हल से देश की गरीब जनता का भला होने वाला है, उन पर बिल्कुल या बहुत ही न्यूनतम ध्यान दिया जाता है।
इस बात को एक उदाहरण के माध्यम से बड़ी आसानी से समझा जा सकता है। गांव में जब चोर एक ग्रुप में जानवरों की चोरी करते हैं तो वे सबसे पहले उस जानवर के गले में बंधी हुई घंटी को खोलते हैं और उनमें से एक व्यक्ति उस घंटी को एक दिशा में गांव वालों को दिग्भ्रमित करने के लिए ले जाता है। और दूसरे लोग जानवरों को दूसरी दिशा में ले जाते हैं। घंटी की आवाज सुनकर गांव वालों को लगता है कि जानवर घंटी की आवाज आने वाली दिशा में जा रहा है परंतु वास्तव में जानवर किसी दूसरी दिशा में जा रहा होता है। गांव के लोग झूठी घंटी की आवाज से दिग्भ्रमित हो जाते हैं और वे घंटी की दिशा में चेज करते हैं। बाद में उन्हें पता लगता है कि उन्हें मूर्ख बनाया गया है और उनके जानवरों की चोरी हो हो गई है।
इसी बात को यदि हम गहराई से देखें तो पता चलता है कि मंदिर, मस्जिद, हरा-भगवा, अतीत की बातें, धर्म, दिखावा, जातिपांती, क्षेत्र इत्यादि लोगों को भावनाओं के माध्यम से घंटी से जोड़ना है। जबकि मूलभूत मुद्दे जैसे गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं, पीने योग्य पानी, फसल का मूल्य, उर्वरक की समय व सही दर पर सप्लाई, महंगाई इत्यादि की ओर उनके ध्यान को जाने ही नहीं दिया जाता है। जनता को बहुत सोच समझ कर तय करना चाहिए कि घंटी पर ध्यान भटकाएँ या मुद्दों पर ध्यान दें।
वोट करते समय महत्वपूर्ण मुद्दों को ध्यान में रखें और समझदारी से योग्य व अच्छे उम्मीदवार को वोट दें ताकि देश का विकास हो सके और झूठी घंटी बजाने वालों से देश को बचाया जा सके।
रघुवीर प्रसाद मीना

Wednesday, 21 November 2018

जो लोग अधिकारियों से सहायता चाहते है, उन्हें सलाह।

rpmwu156
20.11.2018

जो लोग #अधिकारियों_से_सहायता चाहते है, उन्हें #सलाह।
1. सोमवार को अवोईड़ (avoid) करें क्योंकि अधिकारी मिटिंगस् में व्यस्त रहते है।
2. आॅफिस के खुलते ही नहीं जाये क्योंकि सुबह सुबह अधिकारी कार्य की प्लानिंग करते है। सामान्यतः 12:00 से 1:30 बजे या 3:00 से 5:00 बजे का समय उपयुक्त हो सकता है।
3. बार बार लगातार फोन नहीं करें, क्योंकि व्यक्ति विशेष कार्य में व्यस्त हो सकता है। अच्छा रहेगा अपने परिचय के साथ मैसेज करें।
4. बेहतर होगा अधिकारियों से कार्यालय के काम के सम्बन्ध में कार्यालय के समय में ही बात करें। ऐसा करने से आपके कार्य पर तुरंत कार्यवाही का प्रारंभ होना संभव है।
5. जब भी मिलने जाये तो सम्बंधित अधिकारी का नाम व कार्यालय का फोन नंबर व मोबाइल नंबर अवश्य रखें।
6. संबंधित मुख्य मुख्य दस्तावेजों को ही वाट्सऐप पर भेजें। अनावश्यक दस्तावेजों को बल्क में नहीं भेजें।
7. यदि कोई अधिकारी आपकी बात सुन रहा हो तो अनावश्यक दूसरों का रिफरेंस नहीं दे।
8. अधिकारियों से मदद मांगने से पूर्व पहले नीचे स्तर पर जानकार स्टाफ या पर्यवेक्षकों से अवश्य मदद लेने की कोशिश करे।
9. फोन पर या कार्यालय में अनावश्यक वार्ता/ऑफ़र जैसे मिठाई , खर्चा पानी, पैसे के लेन देन की बात नही करें। इन बातों को सुनकर ईमानदार प्रवृत्ति के अधिकारियों का मन खराब होता है।
10. जिसको सम्पूर्ण मामले की जानकारी हो यदि वही व्यक्ति बात करें तो बेहतर होगा।
रघुवीर प्रसाद मीना

Tuesday, 13 November 2018

समझदारी के साथ चुनाव में योग्य नेता चुने।

rpmwu154
12.11.2018

राजनीतिक पार्टियां उनकी विभिन्न मजबूरियों एवं सोची समझी चाल के कारण ऐसे लोगों को टिकट दे देती है जो कि किसी भी तरह से नेता बनने के योग्य नहीं है। न तो वे कोई पॉलिसी फॉर्मूलेशन में सहायक हो सकते हैं और ना ही उनके इंप्लीमेंटेशन में। ऐसे लोग 5 वर्ष के लिए विधानसभा या लोकसभा क्षेत्र का नाम मात्र का प्रतिनिधित्व करते हैं एवं उस क्षेत्र विशेष का कोई विकास नहीं करवाते हैं और न हीं करवा सकते हैं।
हो सकता है कोई व्यक्ति आप की जाति, धर्म, समुदाय का हो या आपका जानकार हो या आपका रिश्तेदार हो हो सकता है वह आपका चाचा, बाबा, भतीजा, मामा या फिर बुहा, बहन, भतीजी, दादी इत्यादि लगते हो तो उनका पूरा आदर व सम्मान करें परंतु यदि वह योग्य नेता नहीं है तो उसे नहीं चुनना चाहिए।
केन्द्र व राज्य सरकार के बजट के आंकड़ों के अनुसार हर व्यक्ति के हिस्से में 5 वर्षो लगभग ₹5 लाख की भागीदारी आती है अत: वोट का उपयोग महत्वपूर्ण मानते हुए पूर्ण समझदारी व बुद्धिमत्ता से करने की जरूरत है।
संविधान बनाते समय यदि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के स्थान पर किसी जानकार या रिश्तेदार अयोग्य व्यक्ति को कन्टिट्यूयेन्ट असेम्बली का सदस्य बना दिया जाता तो वह संविधान बनते समय केवल तमाशबीन ही बना रहता और बने हुए दस्तावेज पर दस्तखत कर देता। उसमें कमजोर वर्ग के हितों की रक्षा के लिए जो प्रावधान बनाए गए हैं वे कभी नहीं होते। हमें सोचना होगा कि हम क्या चाहते हैं अच्छे नेता या केवल जानकार, रिश्तेदार, बहन, बुआ, भतीजी, दादी, नानी, काका, बाबा, दादा, नाना इत्यादि।
रिश्तेदारी निभाना एक सामाजिक दायित्व है और अच्छे नेता का चुनाव करना एक गंभीर बुद्धिमता का द्योतक है। यदि हम स्वयं और देश व समाज की वास्तव में भलाई चाहते हैं तो हमें अच्छे नेताओं को चुनना होगा ना कि जानकार या रिश्तेदार या जाति या धर्म या समुदाय के आधार पर अयोग्य व्यक्तियों को।
यह भी देखा गया है कि कई नेता हर बार अपने क्षेत्रों को बदल लेते हैं। इसके पीछे मुख्य कारण यह होता है कि उन्होंने पिछले कार्यकाल में उनके क्षेत्र में कोई विशेष विकास कार्य नहीं करवाया होता है जिसके कारण वहां के वोटर उससे नाराज रहते हैं और वह हर चुनाव में नए-नए क्षेत्रों में जाकर अपने भाग्य को  अजमते रहते हैं। कई बार यह भी दिखाई देता है कि बाहरी व्यक्ति क्षेत्र विशेष में जाकर चुनाव जीतने के बाद वहां की गतिविधियों में बहुत कम रुचि लेते हैं और वह क्षेत्र अपने आप ही पिछड़ा रह जाता है।
उपरोक्त सभी के मद्देनजर विचारणीय बिंदु है कि अपने वोट के महत्व को पहचाने और योग्य नेता चुने ना कि अयोग्य व्यक्ति।
रघुवीर प्रसाद मीना

Monday, 12 November 2018

धर्म या अधर्म के लिए कौन है जिम्मेदार? व्यक्ति क्या करें?

rpmwu153
12.11.2018

हमेशा कहा जाता रहा है कि धर्म से जनमानस की भलाई होती और अधर्म से विनाश। जबकि वास्तव में अगर बहुत सरसरी तौर पर भी देखा जाएँ तो पता चलता हैं कि क्रिश्चियन धर्म में काले लोगों पर गोरे लोगों ने बहुत अधिक अत्याचार किया था। महात्मा गांधी जैसे व्यक्ति को ट्रेन के डिब्बे से सामान के साथ बाहर फेंक दिया गया, केवल और केवल रंगभेद के कारण। इसी प्रकार हिंदू धर्म मानने वाले लोगों ने दूसरे हिंदू धर्म मानने वाले अछूतों के साथ बहुत ज्यादा अत्याचार किया जिससे सभी भली-भांति परिचित है। यहां तक की अछूतों को पढ़ने, ज्ञान की बातें सुनने व बोलने इत्यादि इत्यादि पर प्रतिबंध था। मुस्लिम धर्म में भी यदि देखें तो दूसरे धर्म के लोगों का कोई सम्मान नहीं है। वे तो कहते हैं  कि या तो व्यक्ति मुस्लिम हो अन्यथा वह काफिर है, वे चाहते हैं कि सभी लोग मुस्लिम बन जाएँ। इसी प्रकार अन्य धर्मों में भी धर्म के नाम पर अधर्म की नीति चलती आ रही है। निम्न प्रश्नों का उत्तर ढूंढने की जरूरत है-
धर्म के नाम पर मनुष्य का मनुष्य द्वारा शोषण एवं मूर्ख बनाना कैसा धर्म है? यह अधर्म क्यों नहीं है? उस धर्म विशेष के लोग इस प्रकार अधर्म गतिविधियों को क्यों नहीं रोकते हैं? क्यों नहीं गलत करने वालों को दंडित किया जाता है? जो चीजें पहले धर्म के नाम पर सही ठहराई जाती थी वे अब धीरे धीरे क्यों खराब सिद्ध होने लगी है? सदियों तक जो गलत चीज सही मानकर चल रही थी उसके लिए कौन जिम्मेदार था? और जो जिम्मेदार थे उन लोगों को क्या सजा मिल रही है?  भूतकाल में जो हो चुका है उसको यदि भूल भी जाए तो वर्तमान में धर्म के नाम पर छुआछूत, भेदभाव, दमनकारी गतिविधियों के लिए क्यों नहीं रोक लगाई जा रही है? क्यों नहीं कड़े कानून के माध्यम से इस प्रकार के दमनकारी लोगों पर अंकुश लगाया जा रहा है?
अभी भी कुछ कुटिल लोग जो अपने आप को ज्यादा समझदार होने की बातें करते हैं वे, जिनका भूतकाल में शोषण हो चुका है और अब ऊपर उठ रहे हैं, को पचा नहीं पा रहे हैं। और आये दिन विभिन्न प्रकार के प्रपंच रचने में लगे रहते है। ऐसे लोगों को आईडेंटिफाई करने की आवश्यकता है और उनसे सजग रहकर दूरी बनाने एवं उनके बहकावे में नहीं आने की जरूरत है। उचित मौके पर उनको स्पष्ट जबाव देने की भी जरूरत है। कोई भी ऐसी गतिविधि नहीं की जानी चाहिए जिससे शोषण करने वाले लोगों को लाभ हो।
अत: आवश्यकता है कि धार्मिक अंधविश्वास के प्रदूषण (DAP) से व्यक्ति अपने आप को दूर रखें और दूसरों को भी दूर रहने की सलाह दें, साथ ही धर्म के नाम पर चल रही लूट को रोके।  हर व्यक्ति को उसके जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने की जरूरत है साथ ही उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य को पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी के साथ संपादित करें, यही सबसे बड़ा धर्म है।

Wednesday, 7 November 2018

सेवानिवृत्त लोगों को पुन: नौकरी देना बेरोजगार युवाओं के साथ न्याय नहीं है।

rpmwu151
07.11.2018

पिछले कुछ दिनों में सरकार में सेवानिवृत्त लोगों को पुनः जॉब देना एक ट्रेंड सा बन गया है। सेवानिवृत्त व्यक्ति को उसके सेवाकाल में प्राप्त सैलेरी से की गई बचत के साथ साथ पेंशन भी मिलती और वह सामान्यतः उसकी सभी जिम्मेदारियां से मुक्त रहता है जिसकी वजह से उसे आर्थिक रूप से और धन की उतनी आवश्यकता नहीं होती जितनी की एक बेरोजगार युवा को होती है। साथ ही साथ सेवानिवृत्त व्यक्ति की कार्य करने की क्षमता भी कम हो जाती है। वे उतने स्फूर्तिमान व एफिशिएंट नहीं हो सकते जितने की नए युवा।
सेवानिवृत्त व्यक्तियों को पुनः रोजगार देना और युवाओं को नये रोजगार से वंचित रखना किसी प्रकार से समझदारी नहीं लगती है। आर्थिक पैमाने पर भी यदि देखें तो जब व्यक्ति नया भर्ती होता है तो उसकी पे स्केल इत्यादि काफी कम रहती है जिसके कारण उनको दिए जाने वाले वेतन न्यूनतम स्तर का ही रहता है। वैसे भी सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि युवाओं को अधिक से अधिक रोजगार मुहैया कराएं।
परंतु आजकल देखा जा रहा है कि सरकार में पदों की रिक्तियों को समय पर नहीं भरा जाता है  और या तो अधिकतर कार्य संविदा पर करवाए जा रहे हैं और या सेवानिवृत्त लोगों को पुनः रखा जा रहा है। ऐसा करने से युवा वर्ग रोजगार से वंचित हो रहा है। दूसरी ओर अधिकतर सेवानिवृत्त व्यक्ति पद को तो आॅक्यूपाई कर लेते हैं परंतु वांछित गुणवत्ता का कार्य नहीं कर पाते है।
इस पहलू को सभी प्राधिकारियों को गहराई से समझने की आवश्यकता है कि किस प्रकार सेवानिवृत्त व्यक्तियों को दिए जाने वाले पुन: रोजगार को रोका जाए और उनके स्थान पर नए युवाओं को रोजगार मुहैया कराया जाये।
कृपया इस विषय पर अपने अपने विचार व्यक्त करें।