Friday, 18 June 2021

खुशी एवं संतोष : अच्छे व मददगार पलों में है।

rpmwu408 dt. 18.06.2021

 खुशी और मन में संतोष किन चीजों से तत्काल (इस्टैंट) रूप में आता है? आपके साथ कभी किसी ने अच्छा किया हो, आपकी मदद की हो उनमें से दो महत्वपूर्ण पलों को याद करें एवं इसी प्रकार जब आपने किसी की मदद की हो उनमें से भी दो पलों को भी याद करें। दोनों स्थितियों में आपको अच्छा महसूस होगा। परन्तु ठीक इसी के विपरीत, यदि आपके साथ किसी ने खराब किया या आपने किसी के साथ खराब किया तो इन दोनों ही स्थितियों में आपको खराब महसूस होगा। 

जब इतनी सरल सी बात है कि अच्छा करने की घटनाओं को याद करने मात्र से लोंगलास्सटिंग प्रसन्नता मिलती है, खुशी होती है व संतोष मिलता है तो हमें चाहिए कि हम अपनी जीवनशैली में विचार व आत्मावलोकन करके दूसरों की मदद व उनके जीवन को सुलभ बनाने की सोच विकसित करे एवं व्यवहार में अपनाएं।

सादर 
रघुवीर प्रसाद मीना 

Thursday, 17 June 2021

#कृतज्ञ रहे व स्वयं भी दूसरों के लिए सार्थक करें।

rpmwu407 dt. 17.06.2021

जब चीजें आसानी से मिलती है तो उनकी वैल्यू या उनके पीछे मेहनत व लगा समय समझ नहीं आता है। रोटी तो महज़ आसानी से समझने के लिये एक उदाहरण है। यदि गहराई से समझे तो महसूस कर सकते है कि हमारे जीवन में काम आने वाली या जीवन को सुलभ बनाने वाली हर चीज के पीछे किसी की बहुत मेहनत, लगन व रिसर्च तथा बनाने में समय लगा हुआ है।


रोटी के साथ कपड़ा, घर, बिजली, घर में आने वाला पानी, टीवी, मोबाइल, चश्मा, किताबें, पेन, व्हीकल, दवाईयां व वैक्सीनस्, रेल, रोड, हवाईजहाज़, जुते, घर के उपकरण व मशीनें इत्यादि और जिसके बारे में आप सोचे उसे बनाने के पीछे बहुत मेहनत, रिसर्च व समय लगा हुआ है। हम इनको आसानी से उपयोग में लेते है।


उपरोक्तनुसार हम सभी, बहुत सारे दूसरे लोगों के ऋणी है। अतः हमें दूसरों के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए एवं हमें स्वयं भी दूसरों के जीवन को बेहतर व सुलभ बनाने के लिये सार्थक काम करने चाहिए।


सादर

Raghuveer Prasad Meena

Monday, 14 June 2021

धन के अभाव में भी व्यक्ति बहुत कुछ कर सकता है। आचार विचार उत्तम रखने में धन नहीं चाहिये।

rpmwu406 dt 14.06.2021

उपरोक्त लेख में बहुत ही जोरदार सीख लिखी है। किसी व्यक्ति को अपने आप को उसके मन में अच्छा समझने से दूसरा कोई भी नहीं रोक सकता है। व्यक्ति अपने भाव में उच्च विचार रखें व दूसरों की मदद करने की भावना विकसित करे। ऐसा हरेक व्यक्ति को स्वयं ही करना है। हालांकि आसपास के वातावरण से फर्क पड़ता है, उदाहरणार्थ यदि कोई बाग बगीचों व फूलों में घूम रहा हो तो उसके मन में अच्छे भाव आयेंगे और यदि वह गंदे नाले या सड़ी गली चीजों के आसपास है तो वह खराब ही सोचेगा। व्यक्ति की कड़ी मेहनत व अनेकों जतनो के पश्चात भी यदि वह आसपास के वातावरण में बदलाव नहीं कर सके तो उसे जगह बदल लेना ही श्रेष्ठतम है। संगत का भी व्यक्ति की सोच बनने में अतिमहत्वपूर्ण रोल होता है, अतः संगत सोच समझकर ही तय करें एवं यदि सही नहीं है तो ज्यादा समय तक उसमे नहीं रहे, बदल लेने में ही समझदारी है। 

बिना धन के ही कोई भी व्यक्ति दूसरों के मिलने पर मुस्कुरा सकता है, मीठी वाणी में बात कर सकता है, प्रशंसा कर सकता है, शुभकामनाएं दे सकता है एवं अपने हाथों से मदद कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति इस प्रकार का व्यवहार अपनाए तो वह जीवन में स्वयं के प्रयत्नों व दूसरों की मदद एवं आशिर्वाद से जरूर ही सफल हो जाएगा।

सादर
रघुवीर प्रसाद मीना 

Saturday, 12 June 2021

जहाँ न्याय नहीं वहां उजाड़ निश्चित है। अत: न्यायपूर्ण व्यवहार करें।

rpmwu405 dt. 12.06.2021

एक अच्छी सीख है कृपया अवश्य पढ़ें....

एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए, उजड़े वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये!

हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ?? 

यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा !

भटकते-भटकते शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज की रात बीता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे !

रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे, उस पर एक उल्लू बैठा था।

वह जोर से चिल्लाने लगा।

हंसिनी ने हंस से कहा- अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते।

ये उल्लू चिल्ला रहा है। 

हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ??

ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही।

पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों की बातें सुन रहा था।

सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई, मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ करदो।

हंस ने कहा- कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद! 

यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा 

पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो।

हंस चौंका- उसने कहा, आपकी पत्नी ??

अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है,मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है!

उल्लू ने कहा- खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है।

दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग एकत्र हो गये। 

कई गावों की जनता बैठी। पंचायत बुलाई गयी। 

पंचलोग भी आ गये!

बोले- भाई किस बात का विवाद है ??

लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है!

लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे।

हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है। 

इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना चाहिए! 

फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों की जाँच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की ही पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है!

यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया। 

उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली!

रोते- चीखते जब वह आगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई - ऐ मित्र हंस, रुको!

हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ?? 

पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ?

उल्लू ने कहा- नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी! 

लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है! 

मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है।

यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं! 

जहाँ भी दुर्दशा है उसका मूल कारण अनैतिक न्याय व्यवस्था व न्याय नहीं मिलने की सोच से अत्याचार के विरूध्द आवाज नहीं उठाना है।

हम स्वयं का आत्मावलोकन करें और अपने आप में सही को सही व गलत को गलत कहने का साहस लायें और दूसरो को ऐसा व्यवहार करने हेतु प्रेरित करें। किसी जगह/समाज/परिवार में यदि न्याय सही होने लगे तो वहां उन्नति व विकास और खुशहाली अवश्य होगी।

(यह कहानी हमारे एक वरिष्ठ साथी श्री रामप्रसाद जी ने शैयर की है, मैंने फोटो लगाया है एवं अंतिम निष्कर्ष में मेरी सोच से बदलाव किये है।) 

सादर 
रघुवीर प्रसाद मीना 

Thursday, 10 June 2021

Elite (अभिजात) : जो कमजोर का ध्यान नहीं रखे वह एलीट कहलाने योग्य नहीं है।

rpmwu404 dt. 10.06.2021

शब्दकोश की परिभाषा के अनुसार एलीट (अभिजात) सबसे धनवान, सबसे शक्तिशाली, सबसे ज्यादा पढ़ा लिखा अथवा सबसे प्रशिक्षित ग्रुप के लोग होते है।

यदि कोई व्यक्ति उससे आर्थिक, शारीरिक, मानसिक, सामाजिक या अथॉरिटी में कमजोर व्यक्तियों का शोषण करें अथवा उनसे अपेक्षित ढंग से व्यवहार नहीं करे या प्रताड़ित करे तो क्या ऐसे लोग एलीट कहलाने योग्य है? मेरे मतानुसार बिलकुल नहीं, क्योंकि कोई व्यक्ति यदि उससे कमजोर का शोषण करे तो वह मानसिक रूप से बिलकुल भी एलीट नहीं है वह लालची या खुदगर्ज या घमंडी या कम समझदार होने की वजह से मानसिक रूप से कम विकसित है। दूसरों का ध्यान नहीं रखने वालों को एलीट समझा ही नहीं जा सकता है। 

छोटे कर्मचारियों व जूनियर्स पर बेवजह रोब जमाने वाले, ठेके के कर्मियों के न्यूनतम वेतन की चोरी करने वाले, रिश्वत लेने वाले, कमजोर व गरीब का शोषण व अत्याचार व उनकी मजबूरी का लाभ उठाने वाले लोग एलीट नहीं हो सकते है।

यदि किसी को वास्तविक रूप से एलीट ग्रुप का सम्मान चाहिए तो उसे कमजोर व गरीब का सम्मान व मदद करनी चाहिए। उनके जीवन को बेहतर बनाने में प्रसन्नता महसूस करनी चाहिए। किसी भी प्रकार का शोषण तो कदापि नहीं करें। छोटों के जीवन को बेहतर बनाना ही मानवीयता व एलीट होने की खास पहचान है। 

सादर 
रघुवीर प्रसाद मीना 

Wednesday, 9 June 2021

निष्ठा (Loyalty) सकारात्मक है परन्तु अंधनिष्ठा बेहद नुकसानदायक होती है।

 

rpmwu403 dt. 09.06.2021

निष्ठा को हमेशा सकारात्मक समझा जाता है। परन्तु देखा गया है कि आर्थिक रूप से कमजोर अथवा सामाजिक रूप से पिछड़े व्यक्ति या समाज जिस व्यक्ति या सिस्टम के प्रति निष्ठावान होते है वे लम्बे अरसे तक निष्ठावान बने रहते है। वे उनकी निष्ठा को जल्दी से परिवर्तित नहीं करते है। इसके विपरीत आर्थिक रूप से सक्षम व सामाजिक रूप से अग्रणी व्यक्ति या समाज समय की आवश्यकता के अनुसार अपनी निष्ठा में बिना बहुत अधिक देरी किये परिवर्तन कर लेते है। 

गलत या दकियानूसी व्यक्तियों या सिस्टम्स या संस्थाओं या रीति-रिवाजों के प्रति एक ढर्रे पर चलते हुए निष्ठावान बने रहना अंधनिष्ठा है जो कि किसी भी व्यक्ति या समाज के लिए गंभीर रूप से नुकसानदेह है। यदि कोई व्यक्ति या सिस्टम या संस्था या रीति-रिवाज गलत ढर्रे पर चलने लगे या दकियानूसी हो जाये तो उसके प्रति निष्ठावान बने रहना कोई समझदारी नहीं है। हमें अपनी निष्ठा बहुत सोच समझकर तय करनी चाहिए एवं समय की आवश्यकतानुसार उसमें परिवर्तन करने में कोई गलत या अनैतिक नहीं है।

सादर 
रघुवीर प्रसाद मीना 

Behaviour of a gentleman

SOME SOCIAL RULES THAT MAY HELP YOU:

1. Don’t call someone more than twice continuously. If they don’t pick up your call, presume they have something important to attend to;

2. Return money that you have borrowed even before the person that borrowed you remember or ask for it. It shows your integrity and character. Same goes with umbrellas, pens and lunch boxes.

3. Never order the expensive dish on the menu when someone is giving you a lunch/dinner.

4. Don’t ask awkward questions like ‘Oh so you aren’t married yet?’ Or ‘Don’t you have kids’ or ‘Why didn’t you buy a house?’ Or why don't you buy a car? For God’s sake it isn’t your problem;

5. Always open the door for the person coming behind you. It doesn’t matter if it is a guy or a girl, senior or junior. You don’t grow small by treating someone well in public;

6. If you take a taxi with a friend and he/she pays now, try paying next time;

7. Respect different shades of opinions. Remember what's 6 to you will appear 9 to someone facing you. Besides, second opinion is good for an alternative;

8. Never interrupt people talking. Allow them to pour it out. As they say, hear them all and filter them all;

9. If you tease someone, and they don’t seem to enjoy it, stop it and never do it again. It encourages one to do more and it shows how appreciative you're;

10. Say “thank you” when someone is helping you.

11. Praise publicly. Criticize privately;

12. There’s almost never a reason to comment on someone’s weight. Just say, “You look fantastic.” If they want to talk about losing weight, they will;

13. When someone shows you a photo on their phone, don’t swipe left or right. You never know what’s next;

 14. If a colleague tells you they have a doctors' appointment, don’t ask what it’s for, just say "I hope you’re okay". Don’t put them in the uncomfortable position of having to tell you their personal illness. If they want you to know, they'll do so without your inquisitiveness;

15. Treat the cleaner with the same respect as the CEO. Nobody is impressed at how rude you can treat someone below you but people will notice if you treat them with respect;

16. If a person is speaking directly to you, staring at your phone is rude;

17. Never give advice until you’re asked;

18. When meeting someone after a long time, unless they want to talk about it, don’t ask them their age and salary;

19. Mind your business unless anything involves you directly - just stay out of it;

20. Remove your sunglasses if you are talking to anyone in the street. It is a sign of respect. Moreso, eye contact is as important as your speech; and

21. Never talk about your riches in the midst of the poor. Similarly, don't talk about your children in the midst of the barren.

22.After reading a good message try to say       "Thanks for the message".

APPRECIATION remains the easiest way of getting what you don't have.... ❤❤

from NC Meena's fb page

Tuesday, 8 June 2021

1st_May #the_international_labour_day



 rpmwu402 dt. 08.06.2021
#1st_May #the_international_labour_day

The real producers of wealth have always remained the lowest group in the society. जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए। आआो हम सभी आज अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के अवसर पर प्रण ले कि काम करने वाले हर व्यक्ति को उसका हक व अधिकार दिलाये। उसका सम्मान करें। सरकार द्वारा तय न्यूनतम मजदूरी तो कम से कम दिलाने में सकारात्मक भूमिका निभायेे। काम करने वाले हर व्यक्ति की परेशानियों को कम करने में हम जो भी कुछ कर सकते है वह हमें करना ही चाहिये। सादर Raghuveer Prasad Meena