Monday, 11 May 2020

#विचार व #भावनाओं का #स्वत:_हस्तांतरण होता है। #Auto_transmission of #thoughts & #feelings.

Nature                                     Nurture
rpmwu350 dt. 11.05.2020

यदि कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के प्रति मन में खराब भाव रखता है तो दूसरे के मन में स्वत: ही पहले वाले के प्रति खराब विचार व भाव आ जाते है। यह बिलकुल ओटो ट्रांसमिट होता है। अत: स्वयं की भलाई के लिए अपने #मन में #दूसरों के प्रति #अच्छा #भाव रखने का प्रयास करें। 

प्रत्येक मनुष्य की बनावट, स्वभाव व सोचने और व्यवहार करने के तरीकें में नेचर (प्रकृति, nature) और नर्चर (पालन-पोषण, nurture) दो चीजों का बहुत बड़ा रोल होता है। नेचर का अर्थ नेचुरल चीजों है जो उसे मां-बाप के डीएनए, जन्म के स्थान व आसपास की प्रकृति से प्रदत्त होते हैं उदाहरणार्थ व्यक्ति की शारिरिक बनावट व रंगरूप माँ बाप व आसपास की प्रकृति पर निर्भर है। नर्चर का मतलब उसके बचपन से बड़े होने तक के पालन पोषण व मनुष्य द्वारा उत्पन्न अप्राकृतिक वातावरण (धर्म, जाति, समुदाय, दूसरों के प्रति व्यवहार की सोच) है। व्यक्ति जैसे वातावरण व माहौल अपने आस पास देखता है वह उसी के अनुसार ढ़ल जाता है। यदि संक्षेप में कहा जाए तो नेचर व्यक्ति की हार्डवेयर तैयार करती है एवं नर्चर सॉफ्टवेयर। छोटी उम्र में, इन दोनों चीजों पर व्यक्ति का कोई कंट्रोल नहीं होता है। परंतु जब व्यक्ति बड़ा हो जाता है तो उसे विचार करना चाहिए कि कहीं नेचर और नर्चर के कारण उसकी हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर मेंं कोई कमी तो नहीं है? यदि हार्डवेयर अर्थात् बाॅड़ी की बनावट मेंं कमी है तो संतुलित खानपान व योगा, प्रणायाम, कसरत, जिम इत्यादि से सुधार किया जा सकता है। इसी प्रकार यदि व्यक्ति को लगता है कि उसकी सॉफ्टवेयर (सोच, विचारधारा) संकुचित है तो वह अच्छी पुस्तकों व महापुरुषों की जीवनी के अध्ययन, समाज-सुधार व मानवीय पहलूओं पर आधारित फिल्मों के अवलोकन, अच्छे लोगों की संगत व स्वयं के मनन से उसकी सोच व व्यवहार को व्यापक बनाकर उनमें सुधार कर सकता है और धर्म, जाति, समुदाय इत्यादि द्वारा प्रदत्त भेदभावों से ऊपर उठकर दूसरों के बारे में स्वयं के मन में न्यायपूर्ण व कल्याण की सोच विकसित कर स्वयं केे साथ साथ सम्पूर्ण मानवता का भला कर सकता है।

रघुवीर प्रसाद मीना 

Sunday, 10 May 2020

माँ को समर्पित दिन : मदर्स डे (Moder's Day)


rpmwu349 dt. 10.05.2020
मनुष्य व जीव जगत के प्रत्येक प्राणी के अस्तित्व एवं उसके पालन पोषण में माँ का अद्वितीय रोल रहता है। माँ विभिन्न प्रकार की परेशानियों को झेल कर अपनी संतान को हर सम्भव सुख देना चाहती हैं। संतान के सुखी रहने पर माँ को असीम खुशी एवं सुकून मिलता हैं। जब माँ गर्भ धारण करती है तब से ही वह अपनी संतान की हेल्थ के प्रति सजग रहना शुरु कर देती है और होने वाली संतान की अच्छी हेल्थ के लिए वह उसके जीवन की परिस्थितियों में जो भी अच्छे से अच्छा हो सके उसके लिए हरसंभव प्रयत्न करती हैं। वह संतान के उत्तम शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए यथासंभव संतुलित खाना व अच्छे आचार विचार मन में लाने की कोशिश करती हैं। संतान के उत्पन्न होने पर कई माँओं की जान चली जाती है और जो माँ सफलतापूर्वक अपने बच्चे को जन्म देती है वे अपने आप को गीले में रख कर संतान को सूखे पर लेटाती हैै। बच्चे को किसी प्रकार का कष्ट नहीं हो वह उसके लिए हर संभव प्रयास करती हैं। खुद रात में बच्चे का ध्यान रखने में नहीं सोती है और दिन में घर के काम में व्यस्त होने के कारण उसकी सेहत पर विपरीत प्रभाव पड़ने के बावजूद भी वह इस बात से नहीं घबराती है और बच्चे का अच्छे से अच्छा पालन पोषण करती है। जब खाना खातेे है तो माँ पहले अपने छोटे बच्चों को खिलाती है और सबसे बाद मेंं जो भी बचता है उससे खुद का काम चलाती है। जो भी इस लेख को पढ रहे है उन सबकी माँओं ने उनकेेेे लिए विभिन्न प्रकार के कष्ट व असुुविधाएं झेली हैं। व्यक्ति के बड़े होने पर माँ हमेशा चाहती है कि वह सफल बने और उसके जीवन में उसे उत्तम से उत्तम सुख सुविधाएं प्राप्त हो, माँ इस बात की हमेशा कामना करती हैं। 

कोई भी मनुष्य उसकी माँ के ऋण को तो पूरी तरह नहीं चुका सकता है परंतु जीवन में माँ को प्रसन्न रखने के लिए काफी कुछ कर सकता है। यदि व्यक्ति माँ के सपनों को साकार करें तो उसकी माँ को बहुत प्रसंता और सुख की अनुभूति होगी। व्यक्ति को कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे लोग उसकी माँ की कोख कोशे। यदि व्यक्ति उसका व्यवहार स्वयं एवं दूसरों की माँओं अथवा होने वाली माँओं के प्रति अच्छा रखें तो यह वास्तव में एक मनुष्य के लिए माँ का ऋण चुकाने का एक जोरदार प्रयास है। 


मनुष्य को स्वयं व उसके बच्चों को जन्म देने वाली हर माँ एक महिला ही है। महिला शारीरिक रूप से पुरुष की तुलना में बहुत भिन्न है। महिला का शरीर, मनुष्य को जन्म दे सकता है और उससे जुड़ी विभिन्न जटिलताओं से युक्त है, लड़कियां बचपन से ही  इन जटिलताओं को झेलती है। भूतकाल में महिलाओं के साथ बहुत अत्याचार होता था, उन्हें पढ़ने लिखने की आजादी नहीं थी। कुछ धर्मों में आज भी महिलाओं के साथ धार्मिक मान्यताओं के आधार पर बहुत अत्याचार हो रहे हैं। सभी को आत्म निरीक्षण करके सोचने की आवश्यक है कि जो धार्मिक व सामाजिक दकियानूसी मान्यताएं महिलाओं की समानता व उनके अधिकारों का हनन करती है, उन्हें स्वयं त्याग दे और दूसरों को त्यागने के लिए प्रेरित करें। यदि हम मदर्स डे पर वास्तव में अपनी मां के स्वाभिमान के लिए कुछ करना ही चाहते हैं तो यह करें कि महिलाओं को सम्मान दें, उनके शोषण व उत्पीड़न को रोके वं हर क्षेत्र में उनको हक दिलाने की मुहिम का हिस्सा बनकर अपने पुरुषार्थ का परिचय दें। संलग्न विडियो में माँ की महिमा पर कवि डाॅ सुनील जोगी द्वारा लिखी पंक्तियां..., अवश्य सुनें और उन पर मनन करके अपनी व दूसरे सभी की माँओं का आदर व सम्मान करें। 


रघुवीर प्रसाद मीना 

इतिहास जानना जरूरी है परन्तु इतिहास पर जरूरत से ज्यादा समय खर्च करना कोई समझदारी नहीं है।

rpmwu348 dt. 10.05.2020

इतिहास को जानकर हर व्यक्ति दुखी होता है। आज जिनकी स्थिति अच्छी है और पहले खराब थी, वे इतिहास को जानकर इस बात से दुखी होते है कि पहले उनकी स्थिति खराब थी। और जिन लोगों की स्थिति अब खराब है और पहले अच्छी थी वे इस बात पर दुखी होते हैं कि उनकी स्थिति अब खराब हो गई है। 

इतिहास को जान लेना ठीक है लेकिन उस पर जरूरत से ज्यादा समय खर्च करना बुद्धिमानी नहीं है। इतिहास में जो जो गलतियां हुई है उन गलतियों की पुनरावृत्ति नहीं की जाए, इस उद्देश्य से इतिहास को पढ़ना और जानना चाहिए। परंतु कई लोग ऐसे हैं जो इतिहास के पीछे इतने ज्यादा पड़े रहते हैं कि वे वर्तमान और भविष्य को बेहतर बनाने के बारे में सोचते ही नहीं है और केवल और केवल अपने भूतकाल के इतिहास को जानने और दुखी होने में स्वयं व दूसरों को व्यस्त रखते हैं। 

आवश्यकता है इतिहास की जानकारी के साथ वर्तमान व भविष्य की स्थिति को कैसे बेहतर बनाया जाएं और कैसे धार्मिक अंधविश्वासों के प्रदूषणों (#DAP) तथा दकियानूसी सोच से बाहर आकर शिक्षा व अपने अधिकारों पर ध्यान दे और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित कर स्वयं और दूसरों के जीवन स्तर में सुधार करे। 

रघुवीर प्रसाद मीना 

Saturday, 9 May 2020

9 मई : महाराणा प्रताप जयंती

rpmwu347 dt. 09.05.2020

महाराणा प्रताप को वीरता, शौर्य और पराक्रम व जन्मभूमि की आजादी के लिए कष्ट झेलने तथा बलिदान देने के लिए याद किया जाता है।

उस समय देश के अधिकतर राजपूत राजा स्वयं के स्वार्थ के लिए मुगलों के साथ संधि कर मुगलों के राज्य के विस्तारीकरण में उनका साथ देकर गुलामी कर रहे थे। परन्तु महाराणा प्रताप जैसे वीर योद्धा की जन्मभूमि की आजादी की लड़ाई में वहां के भील व मीणा आदिवासियों ने जान पर खेलकर अविस्मरणीय साथ दिया था। राणा पूंजा भील जैसे योद्धाओं की वीरता व पराक्रम से हर कोई परिचित है।

महाराणा प्रताप को याद करते समय एक दुखद बात यह भी याद आती है कि जो राजपूत राजा उस समय मुगलों की गुलामी कर रहे थे और महाराणा प्रताप के विरुद्ध लड़ रहे थे ऐसे लोगों के वंशजों को आज भी, अपने आप को राष्ट्रवादी मानने वाले लोग, प्रोत्साहित करते है और राजनीति तक में सफल बनाते है। 

लोगों को किसी एक की ही जय बोलनी चाहिए। या तो महाराणा प्रताप व उसके साथी आदिवासियों की और या मुगल व उनको साथ देने वाले राजवंशों की। व्यक्ति व संस्थाओं को उनकी निति स्पष्ट रखनी चाहिए। 

रघुवीर प्रसाद मीना 

Thursday, 7 May 2020

इनकम टैक्स देने वाले नागरिकों को रिकॉग्नाइज व प्रोत्साहित करने व उन्हें आवश्यकता पड़ने पर सरकारी मदद मिलनी चाहिए।

                                                                                      
rpmwu346 dt. 07.05.2020

हमारे देश की कुल आबादी लगभग 135 करोड़ से भी अधिक है वित्तीय वर्ष 2018-19 के आंंकड़ो के मुुुताबिक 5.78 करोड़ (4. 28%) इनडिविजयूअलस् ने आयकर रिटर्न भरें और उनमे़ से इनकम टैक्स देने वाले लोगों की संख्या केवल 1.46 करोड़ (1.08%) ही थी। जिनमें 1 करोड़ करदातााओं की आय रू. 5 से 10 लाख के बीच थी, मात्र 46 लाख करदाताओं की आय 10 लाख से अधिक रही। वित्तीय वर्ष 2018-19 में कुल प्राप्तियां 23.15 लाखकरोड़ थी, जिसमें आयकर का हिस्सा 4.73 लाखकरोड़ (लगभग 20.50%) था। वित्तीय वर्ष 2020-21 में देश की कुुल प्राप्तियों का अनुमान 30.42 लाखकरोड़ है उसमें से आयकर प्राप्तियों का अनुमान 6.18 लाखकरोड़ (लगभग 21%) हैै। इस प्रकार इनकम टैक्स देने वाले नागरिक देश के विकास व संचालन में महत्वपूर्ण योगदान अदा करते हैं।

जो लोग इनकम टैक्स नहीं देते हैं उनमें दो प्रकार के लोग हैं, अधिकतर लोगों की इनकम उस स्तर में नहीं आती है जिसमें इनकम टैक्स देने की आवश्यकता हो जबकि कई लोग विभिन्न प्रकार के तरीकों से अपनी आय को कम दिखाकर इनकम टैक्स के भुगतान से बचते हैं।  यदि गहराई से देखें तो इनकम टैक्स देने वाले लोगों के प्रति सरकारी कर्मियों का रुख केवल यह रहता है कि क्या उसने कोई टैक्स की चोरी तो नहीं की। सरकारी कर्मियों द्वारा कभी भी नागरिकों के इनकम टैक्स की राशि जमा कराने को सकारात्मक तौर पर रिकॉग्नाइज नहीं किया जाता है, इसके कारण लोगों में टैक्स देने को लेकर कोई उत्सुकता नहीं होती है।  अधिकांश लोग निल टैक्स का रिटर्न भरने का प्रयत्न करते रहते हैं। 

सरकार को हर पैन कार्ड पर कितना इनकम टैक्स प्राप्त हो रहा है यह आंकड़े एकदम सटीक तरीके से पता रहता हैं। इनकम टैक्स देने वाले लोगों के मन में एक सकारात्मक भावना व मोटिवेशन हेतु एक विशेष पहल की आवश्यकता है, जैसे बैंक के कार्ड धारकों को एयरपोर्टस् पर फ्री लाउन्ज एक्सेस व अन्य सुविधाएं देते है उसी तर्ज या बेहतर व्यवस्था करके करदाताओं को प्रोत्साहित करना चाहिए। कम से कम करदाता को ई_मेल के जरिये कर की वर्तमान वित्तीय वर्ष व तब तक के कुल दिये गये टैक्स की राशि के साथ धन्यवाद तो ज्ञापित ही करना चाहिए। एक और महत्वपूर्ण व्यवस्था यह हो सकती है कि अच्छे करदाताओं के जीवन में यदि कभी खराब समय आ जाएं तो उस समय सरकार उनकी आर्थिक सहायता करें।

ऐसी व्यवस्था बनाने से आयकर देने में नागरिकों को अच्छा फील होगा और अधिक से अधिक नागरिक आयकर देने की कोशिश करेंगे। इससे देश व नागरिक दोनों को ही लाभ होगा।

रघुवीर प्रसाद मीना 

Going towards business is important for the flourishing future of an individual and the community.

rpmwu345 dt. 07.05.2020

Entrepreneurship is a very important for the flourishing future of a community. In jobs, people are following Kayasthas (कायस्थ), one can see either their position in the society has been stationary or it has slipped down over last 40-50 years and on the other hand Baniyas (बनिया) following the path of business have tremendously improved their position in the same period.

In jobs one goes along sinusoidal curve generations to generations i.e. top to bottom to top and so on so forth whereas in business it is progressive step graph i.e. efforts of every generation gets cumulatively added and the new generation starts from the point where last one had left.

In a life, one basically achieves a certain amount of money, post/position, contacts and experience, normally except money nothing else can be transferred to the next generation however in business one can transfer all the four very useful things to next generation. Importantly, person doing business provides jobs to many others. Therefore considering all these, communities that are following path of business will progress in much better way.

*What can be done* with ease and without much of the efforts to help people go for business :

1. The person doing business should be respected in our day to day life and functions. It will encourage others.

2. Whatever help one can render to the persons doing business should be done as their success will encourage others to go for business.

3. There should be meetings/functions/programmes especially intended for business related activities where entrepreneurs from the community be allowed to speak up and tell their story.

4. There should be appreciation and awards for persons doing good quality of skilled work.

5. One can use his/her contacts in getting the training for the beginners at existing work places.

6. Whosoever can help financially must help the entrepreneurs at the beginning.

Raghuveer Prasad Meena 

Sunday, 3 May 2020

वीर बाला कालीबाई - बलिदान की एक महान मिसाल

rpmwu344 dt. 03-05-2020
ऐतिहासिक पटल पर गांव रास्तापाल, जिला डूंगरपुर, राजस्थान की पहचान अमर शहीद वीर बाला कालीबाई के नाम से की जाती है। आदिवासी समुदाय भील के सोमा भाई के घर में वीर काली बाई का जन्म जून 1935 में माता नवली की कोख से हुआ। मात्र 12 वर्ष की उम्र में इस क्रांतिकारी बाला ने 19 जून 1947 को जागीरदारों व अंग्रेजों के शोषण के विरूद्ध बहादुरी की एक जोरदार मिसाल कायम कर आदिवासी समाज में शिक्षा की अलख जगाई।
बलिदान की इस महान घटना के समय डूंगरपुर रियासत के शासक महारावल लक्ष्मण सिंह थे और वे अंग्रेजों की हुकूमत की सहायता से अपना राज्य चलाते थे। उस समय के महान समाजसेवी श्री भोगीलाल पंड्या के तत्वाधान में एक जन आंदोलन चलाया गया जो समाज में फैली कुरीतियों को मिटाने तथा शिक्षा को बढ़ावा देने का कार्य करने लगा। डूंगरपुर रियासत के गांव गांव में क्षेत्रीय स्तर पर स्कूल खोले गये उनमें भील, मीणा, डामोर और किसान वर्ग के बालकों को शिक्षा दी जाती थी तथा शिक्षा का प्रचार प्रसार किया जाता था। पाठशाला में आसपास के बालक अध्ययन करने के लिए आने लगे। जब महारावल लक्ष्मण सिंह को इन गतिविधियों का पता चला तो उन्होंने एवं उनके सलाहकारों ने सोचा कि यदि भील और मीणों के बच्चे पढ़ गए, इनको ज्ञान हो गया, शिक्षित हो गए तो मेरे लिए भयंकर परेशानी पैदा हो जाएगी क्योंकि पढ़ने के बाद ये सब अपना अधिकार मांगने लग जायेंगे और इनमें जागृति पैदा हो जाएगी। इस सोच के चलते लक्ष्मण सिंह ने पाठशाला संचालन को रोकने के लिए सन् 1942 में कानून बनाकर पाठशालाओं को बंद करने की योजना बनाई। उन्होंने मजिस्ट्रेट नियुक्त किया और मजिस्ट्रेट ने जगह जगह जहां जहां भील मीणाओं के गांवों में स्कूल खुले हुए थे उनको अभियान चलाकर बंद करवाने लगे । अभियान को सफल बनाने के लिए पुलिस और सेना की भी मदद ली गई। इसी के तहत रास्तापाल की पाठशाला बंद करवाने हेतु एक मजिस्ट्रेट, एक पुलिस अधीक्षक और एक ट्रक भरकर पुलिस व सैनिकों को उस गांव में भेजा गया।
रास्तापाल में नानाभाई खांट गाँव के बालक बालिकाओं को अपने घर बुलाकर विद्या अध्ययन कराते थे। इस पाठशाला में उनका सहयोग देने के लिए अध्यापक के रूप में गांव बेड़ा मारगिया के सेंगा भाई भी अपनी सेवा देते थे। पाठशाला के सभी खर्चे नानाभाई खांट वहन करते थे। राजकीय आदेशों के बाबजूद भी इन्होनें पाठशाला में पढ़ाना जारी रखा। 19 जून 1947 को जब पुलिस नानाभाई खाट की पाठशाला पर पहुंची तब वहां नानाभाई खांट और अध्यापक सेंगा भाई दोनों उपस्थित थे। पुलिस ने दोनों को कमरे में बंद कर बंदूकों के कुंदों से मारना पीटना शुरू कर दिया तथा मजिस्ट्रेट ने नानाभाई को स्कूल में ताला लगाने के लिए कहा। नाना भाई ने ताला लगाने से मना कर दिया तथा चाबी नहीं देने पर सैनिक उन दोनों को ट्रक के पीछे रस्सी से बांधकर घसीटने की तैयारी करने लगे।
अध्यापक सेंगाभाई को पुलिस के द्वारा घसीटा जा रहा था, मजिस्ट्रेट ने पुलिस को सख्त आदेश दे दिए कि जबरदस्ती स्कूल के ताला लगा दिया जाये। नानाभाई और सेंगाभाई ने उनका पुरजोर विरोध भी किया एवं बदले में पुलिस ने उन दोनों पर लाठियां बरसाना शुरू कर दिया। इस घटना से रास्तापाल में वारी सांगी ढोल बजे उठे। यही नहीं, ये वारी ढोल पाल गंदवा, झौथरी, भींडा और अनेक गांवों में बजे और वहां से लोग आने लगे। आसपास के भील मीणाओं ने अपने गुरु जी सेंगाभाई और नानाभाई खांट को छुड़ाने के लिए अपने तरह-तरह के विधान अपनाये। अपने लोगों को बुलाना शुरू कर दिया। क्षेत्र के आसपास के सभी आदिवासियों ने जगह-जगह रास्तों को बंद कर नाकेबंदी कर दी। हजारों की संख्या में नर और नारी अस्त्र शस्त्रों सहित रास्तापाल में प्रवेश करने लगे। आदिवासियों ने जब अपने गुरु जी को पुलिस के द्वारा बंदूकों के बट द्वारा पिटते हुए, कोड़े खाते हुए देखा, तो वे भी दर्द से छटपटा रहे थे। पुलिस उनको बेरहमी से पीट रही थी। असहनीय पीड़ा से नाना भाई ने अपने प्राण त्याग दिए तथा उनके साथी सेगांभाई बेहोश हो गए थे परंतु फिर भी पुलिस के द्वारा उन पर बेतहाशा ज़ुल्म ढाए जा रहे थे। ट्रक के पीछे पुलिस के द्वारा एक रस्सी बांधी गई थी और उस रस्सी के एक सिरे पर सेंगाभाई को कमर से बांध रखा था तथा दूसरा सिरा ट्रक से बांध रखा था। जब यह दृश्य लोगों ने देखा तो वे बहुत अचंभित हुए और उन्हें बहुत दुख भी हुआ लेकिन किसी की भी हिम्मत नहीं हुई जो पुलिस के खिलाफ आवाज उठा सके। सभी लोग एक-दूसरे का मुंह ताक रहे थे और देख रहे थे कि कौन आगे आए, कौन आगे आए, उपस्थित जनसमूह को देखकर वहां के राज अधिकारी घबरा भी रहे थे कि यह भीड़ हमारे ऊपर टूट पड़ी तो हमारी बोटी बोटी को नोच लेगी।
पुलिस की गाड़ी सेंगाभाई को घसीटती चली जा रही थी और उसे बहरहमी से पीट रहे थे। सेंगाभाई हिम्मत करते हुए अपने लोगों को आवाज लगा कर उन्हें उलाहना दे रहे थे कि अरे तुम्हारी वीरता कहां गई? तुम्हारा जोश कहां गया? परंतु उन्हें बचाने की किसी की भी हिम्मत नहीं हुई। तभी अचानक सिर पर घास की गठरी और हाथ में दांतली लिये बिजली की तरह प्रवेश करते हुए एक 12 वर्षीय बालिका ने अपने अदम्य साहस का परिचय दिया तथा उस भीड़ को चीरते हुए सभी लोगों को जोश भरी आवाज से डांटते हुए आगे बढ़ी और पुलिस अधिकारियों से पूछा कि इन दोनों को किस कारण पकड़ा गया है? पुलिस अधिकारी पहले तो चुप रहे पर जब काली बाई ने बार-बार पूछा तो उसने बता दिया कि महारावल के आदेश के विरुद्ध विद्यालय चलाने के कारण इन्हें गिरफ्तार किया जा रहा है। काली बाई ने कहा कि विद्यालय चलाना अपराध नहीं है, गोविंद गुरु जी के आव्हान पर गांवों में विद्यालय खोले जा रहे हैं। वो कहते हैं कि शिक्षा ही हमारी विकास की कुंजी है, पुलिस अधिकारी ने उस आदिवासी बालिका को इस प्रकार बोलते देखा तो वह बौखला गया। पुलिस अधिकारी ने कहा कि विद्यालय चलाने वालों को गोली मार दी जाएगी तब काली बाई ने कहा तो सबसे पहले मुझे गोली मारो। इस वार्तालाप से गांव वाले भी उत्साहित होकर महारावल के विरुद्ध नारे लगाने लगे। इस पर पुलिस अधिकारी ने ट्रक चलाने का आदेश दिया। रस्से से बंधे सेंगाबाई को घसीटते देखकर कालीबाई क्रोध में आ गई, जो गुरुजी उनको प्रतिदिन विद्या अध्ययन कराते थे, उनको पढ़ाते थे, अपने मास्टर जी की यह दुर्दशा देख कर कालीबाई पुलिस की गाड़ी के पीछे दौड़ी तथा जोर-जोर से चिल्लाने लगी कि मेरे मास्टर जी को छोड़ दो, इन्हें क्यों घसीट रहे हो ? इनको कहां ले जा रहे हो? इनको क्यों मार रहे हो ? ऐसे कहते कहते वह अपनी तेज गति से आगे बढ़ती है और गाड़ी के पीछे दौड़ते हुए उसके पास पहुंच जाती है तथा अपने हाथ की दांतली से उस रस्सी को काटना चाहती है। परंतु उस बाला को क्या पता था कि जागीरदारों और अंग्रेजो की पुलिस इतनी निर्दय थी कि वह एक बालिका पर भी गोली चला सकती थी। जब वह गाड़ी के नजदीक पहुंची तो पुलिस ने उनकी गाड़ी को रोक दिया तथा उस वीर बाला कालीबाई को डराया धमकाया और वापस लौट जाने के लिए कहा। परंतु वह कालीबाई एक वीरबाला थी जिसके मन में जोश था और अपने गुरु जी को पुलिस के द्वारा पीटते हुए देखकर उसका खून खौल उठा था, उसने पुलिस की एक नहीं सुनी और अपने मास्टरजी को बचाना चाहती थी और उस रस्सी को जोश भरे हाथों से एक ही झटके में काट दिया, उधर पुलिस वाले बंदूकों को ताने खड़े थे। परंतु कालीबाई ने उनकी बंदूकों और गोलियों की कोई परवाह नहीं की।
छोटी सी बालिका के हौसले को कई महिलाओं ने देखा, सभी ने जोश भरी आवाज में चिल्लाई और जब रस्सी कट गई तो अन्य लोग भी सेंगा भाई के पास आकर खड़े हो गए। सेंगाभाई बेहोश थे। बालिका ने एक महिला से जोश भरी आवाज में कहा कि देखते क्या हो, मेरे गुरुजी के प्राण खतरे में हैं दौड़कर पानी लेकर आओ। जब बालिका का यह तेज और हट पुलिस ने देखा तो पुलिस को बहुत ही गुस्सा आ गया तथा सैनिकों ने उस नन्ही बालिका के ऊपर गोलियों की बौछार कर दी। गोलियां लगने से कालीबाई ने अपने गुरूजी के लिए बलिदान कर दिया तथा अपने नाम को अजर अमर कर दिया। काली बाई के साहस ने भील आदिवासियों की आंखें खोल दी और उन्होंने मारू ढोला बजा दिया भील आदिवासी पुलिस पर आक्रमण करने को तैयार हो गए। पुलिस को मालूम था कि मारू ढोल की आवाज मारने मरने का संकेत है इसलिए वे सब वहां से तुरंत गाड़ी में सवार होकर भाग लिए। इस प्रकार वीर बाला कालीबाई ने अपने बलिदान से सेंगा भाई को बचा लिया और उसने अपने गुरु को बचाकर गुरु शिष्य की इस दुनिया में एक पहचान कायम की और आज कालीबाई के नाम को लोग बहुत ही श्रद्धा के साथ याद करते हैं कि वीर बाला कालीबाई ने अपने प्राण गंवाकर अपने गुरु जी के प्राण बचाए। गुरु शिष्य के ऐसे अनूठे उदाहरण इतिहास में बहुत ही कम मिलेंगे। इसके उपरांत, नानाभाई का शव व घायल कालीबाई और अन्य गांव वालों को चारपाई पर रखकर डूंगरपुर लाया गया। वहां उन्हें इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया गया। परंतु कालीबाई लगभग 40 घंटे तक इलाज कराने के उपरांत भी नहीं बच पाई।
आधुनिक युग में काली बाई ने जो किया वह बहादुरी की एक अनूठी मिसाल थी। 19 जून 1947 को वीर बाला कालीबाई ने जो साहस और बलिदान की मिशाल कायम की वह हमेशा याद रहेगी। उसके बलिदान से आदिवासीयों में नई चेतना जागी तथा काली बाई के नाम पर डूंगरपुर जिले में एक पार्क बनाया गया। पार्क में कालीबाई की प्रतिमा स्थापित की गई। 19 जून को रास्तापाल गांव में मेले का आयोजन भी किया जाता है। इस दिन हजारों की संख्या में लोग एकत्रित होते हैं, रास्तापाल व आसपास के गांवों के लोग आते हैं, बच्चे बुजुर्ग सभी शहीदों की प्रतिमा के सम्मुख खड़े होकर उनको श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए अपने शहीदों को याद करते हुए उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैैं।
यह लेख मूल रूप से श्री तारा चंद मीणा (चीता), सीकर, सम्पर्क सूत्र 9799257635 ने 3 भागों में लिखा था। मैंने इसमें एडिटिंग करके इसको संक्षिप्त किया है।
रघुवीर प्रसाद मीना



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Friday, 1 May 2020

मई 1 : अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस

rpmwu343 dt. 01.05.2020

 संसार के विभिन्न देशों में 1 मई के दिन को अंतर्राष्ट्रीय लेबर डे के रूप में सेलिब्रेट किया जाता है। पहले मजदूरों के कार्य करने के घंटों की कोई सीमा नहीं होती थी, वे 10 से लेकर 16 घंटे तक बहुत ही कम मेहनताने की रकम में कार्य करते थे। अमेरिका के शिकागो शहर में वर्ष 1884 में मजदूरों से जुड़े संगठनों ने तय किया कि 1 मई 1886 के पश्चात मजदूरों के कार्य करने की समय सीमा 8 घंटे की होगी। परन्तु सरकार व बिजनेस के मालिकों ने मजदूरों की यह मांग नहीं मानी। तत्पश्चात 1 मई 1886 को अनेकों मजदूरों ने इस 8 घंटे की समय सीमा की अनुपालना करवाने के लिए आंदोलन किया और 3 मई 1886 को मजदूरों और पुलिस के बीच एक झड़प हुई। उसके उपरांत 4 मई 1886 को हे-मार्केट में मजदूरों ने एक सभा का आयोजन किया जिसमें पुलिस उन्हें खदेड़ने पहुंची तो वार्तालाप के दौरान किसी ने एक बम फेंका जिसमें 7 पुलिसकर्मियों की मृत्यु हो गई। प्रतिउत्तर में पुलिस ने अंधाधुंध फायरिंग की जिसमें कई मजदूर व सिविलियन मारे गए। इस घटना के पश्चात पुलिस ने 8 मजदूर नेताओं को गिरफ्तार कर उन पर केस चलाया। उस वक्त अधिकांश मीडिया व न्यायिक अधिकारी मजदूरों की मांगों के विरुद्ध थे। मीडिया ने विभिन्न तरीकों की खबरों से मजदूर, मजदूर नेताओं व उनकी मांगों की भर्त्सना की। अगस्त 1986 में 8 में से 7 नेताओं को मौत की सजा सुनाई गई। नवम्बर 1987 में जब 7 में से 4 मजदूर नेता खुली फांसी के लिए जा रहे थे तो उन्होंने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की तरह मजदूरों के अधिकारों को बुलंद करने के लिए अलग अलग नारे लगाये। जब इन नेताओं को फांसी दी गई तो मजदूर वर्ग व उनके नेताओं में एक नया जोश उत्पन्न हो गया और उन्होंने कार्य करने की 8 घंटे की समय सीमा की मांग को जोर से दोहराया। जिसे अन्ततः व्यवसाय मालिकों व सरकारों को मानना पड़ा। इस प्रकार खूनी बलिदान के पश्चात मजदूरों को उनके कार्य करने की 8 घंटे की समय सीमा का अधिकार प्राप्त हुआ। इसी बलिदान के उपलक्ष में यह मई दिवस मनाया जाता है। 

हमारे देश में यह दिवस 1923 से मनाया जा रहा है। 1886 के 100 वर्ष बाद 1986 में भारत में चाइल्ड लेबर एक्ट बना जिसमें 14 साल तक के बच्चों से काम करवाने को कानूनन अपराध करार दिया है

अब बात आती है कि आज के समय मजदूरों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए क्या किया जा सकता है? किन मसलों पर गहन विचार व कार्यवाही करके मजदूरों की आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सकता है? कैसे मजदूरों को लगे कि वे देश के सम्मानित नागरिक है? 

मजदूरों का देश की अर्थव्यवस्था में एक बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। यदि मजदूर हाथ से काम करना बंद कर दें तो देश स्टैंड स्टिल हो जाएगा। अत: देश संचालन में मजदूरों के अतिमहत्वपूर्ण रोल के मद्देनजर, #मजदूरों_का_कल्याण भारत के सभी नागरिकों की एक पवित्र व पावन ड्यूटी है। 

माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देशों पर सरकार द्वारा कैजुअल लेबर के हित में अभीहाल में बहुत अच्छे निर्देश जारी किए गए हैं। परंतु दुख की बात है कि अधिकांश जगह इन निर्देशों की वास्तविक अनुपालना नहीं होती है। अधिकतर अधिकारी व कर्मचारी लेबर हित के बारे में ध्यान ही नहीं देते हैं एवं उनकी छोटी सी लालच के अधीन होकर लेबर को मिलने वाले हक को दिलाने में कोताही बरतते है। हालांकि सरकार ने पिछले कुछ दिनों में बैंक भुगतान, ईपीएफ/ईएसआई डिडक्शन को कम्पल्सरी करके सराहनीय कार्य किया है। 

इन निर्देशों में स्पष्ट रूप से लिखा है कि जो कार्य नियमित प्रवृत्ति के हैं उनके लिए कैजुअल लेबर नहीं रखे जाए अर्थात उनके लिए सरकारी लोगों की भर्ती करनी चाहिए परंतु हाउसकीपिंग व साफ सफाई जैसे कार्य जो कि वास्तव में नियमित प्रवृत्ति के हैं उनके लिए सरकार में कैजुअल लेबर के स्थान पर हर जगह ठेके दे दिए गए हैं। अब तो और बहुत से नियमित प्रवृत्ति के कार्यों को अंधाधुंध ठेके पर दिया जा रहा है। ठेके पर जो कर्मी कार्य करते है उनका हाल कैजुअल लेबर से भी खराब है। 

प्रावधान है कि यदि कैजुअल लेबर को जो कार्य दिया गया है वह नियमित सरकारी कर्मचारियों के समान है तो लेबर को सरकारी कर्मियों के समकक्ष भुगतान करना चाहिए यानि प्रतिदिन के हिसाब से सरकारी कर्मियों के भुगतान का 1/30. 

वास्तविकता यह है कि ठेकेदार के पास कार्य करने वाले कर्मियों के सरकारी कर्मचारियों की तुलना में 1/3 से 1/5 भुगतान ही मिलता है। आयेदिन सुनने को मिलता है कि कार्य करने वाले लेबर को मिनिमम वेजेस भी नहीं मिल पाता है। यदि ठेकेदार कागजों पर मिनिमम वेजेस देते भी है तो विभिन्न धोखाधड़ी के तरीकों से उसके उस मिनिमम वेज में से काफी हिस्सा वापस प्राप्त कर लेते हैं।

सभी सरकारी अधिकारी व कर्मचारियों की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि कैजुअल लेबर या ठेके के कर्मी जो कि हमारे ही देश के नागरिक हैं उनके परिवार के भरण-पोषण और उनके बच्चों की उचित परवरिश व पढ़ाई लिखाई के लिए उन्हें कानूनी रूप से तय अधिक से अधिक भुगतान दिलाये। प्राईवेट सैक्टर के बिजनेस के मालिकों व मैनेजमेंट

की भी नैतिक जिम्मेदारी है कि वे उनके मजदूरों को उचित वेतन व अच्छी सुविधाएं मुहैया कराएं। 

रघुवीर प्रसाद मीना