Sunday, 26 August 2018

रक्षाबंधन के अवसर पर प्रण ले कि हम महिलाओं के प्रति और अधिक संवेदनशील व जिम्मेदार बने।

rpmwu130
26.08.2018

रक्षाबंधन के पावन अवसर पर आप सभी को मेरी ओर से बहुत-बहुत शुभकामनाएं एवं बधाई।
आओ इस अवसर पर प्रण की हम बहिनों की रक्षा के साथ साथ सभी महिलाओं के प्रति और अधिक संवेदनशीलता बने एवं जीवन के हर पहलू में सोच समझकर प्रयत्न करे कि उनकी भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचे। यदि कोई व्यक्ति या संस्था लड़कियों या महिलाओं के साथ दूराचार करते हो तो उनके विरूद्ध कानूनी कार्रवाई करवाई जाये।
स्वयं समझे और लोगो को समझाये कि गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग परीक्षण नहीं करवायें। लड़कियों को लड़को की भाँति ही बिना भेदभाव के पाले, पोषे व शिक्षा प्रदान करवाये।
महिलाओं के शरीर की संरचना पुरुष के शरीर की तुलना में बहुत ही पेचीदा होती है। उनके शरीर में एक प्रकार से मानव जीवन की उत्पत्ति हेतु सम्पूर्ण फैक्ट्री है। प्रतिमाह बहुत सारे ब्लड लॅास के साथ उनका मूड़ भी उन दिनों अच्छा नहीं रहता है। गर्भ धारण से बच्चे को जन्म देने की प्रक्रिया बहुत ही जिम्मेदारीपूर्ण है। बच्चों के पालन पोषण की अघिकतर जिम्मेदारी महिलाएं ही उठाती है।
हम में से किसी का भी इस दुनिया में अस्तित्व बिना माँ के सम्भव नहीं हो सकता था। बहनों का भी हमारे जीवन में अमूल्य योगदान रहता है। पत्नि के बिना हर व्यक्ति अधूरा है। बेटियाँ जिन्दगी को जीवंत व दूसरी महिलाओं के प्रति हमारे व्यवहार को संयमित व करूणामय बनाती है।
आओ हम पुन: प्रण ले कि जीवन में हर महिला के प्रति और अधिक संवेदनशील व जिम्मेदार बने।
रघुवीर प्रसाद मीना

Monday, 9 July 2018

हार्ड वर्क से धनवान नहीं बन सकते है। समझदारी पूर्ण स्मार्ट वर्क करने की जरूरत है।

rpmwu129
09.07.2018

CBSE की इतिहास की पुस्तक में लिखा था कि "Real producer of wealth remains lowest group in society". यह बात एकदम सत्य प्रतित होती है। एक दिन मालगोदाम में सीमेंट के बैग खाली करने वाले मजदूरों को देखा, दूसरे दिन धूप में रेल की पररियों के अनुरक्षण में कार्यरत ठेकेदार के कर्मियों को देखा, गटर साफ करने वालों को तो सभी ने देखा होगा, क्या ये लोग धनवान बन सकते है? क्या इनकी मेहनत में कोई कमी रहती है? इसी तरह किसान एवं खेती से जुड़े मजदूरों के कड़े परिश्रम के पश्चात उनकी दयनीय स्थिति क्या बयाँ करती है?
सभी ने पढ़ा होगा कि किये जाने वाले कार्यो को तीन भागों में विभाजित किया गया है। प्रथम - प्राईमरी कार्य जैसे कृषि, पशुपालन इत्यादि, द्वितीय - सैकण्डरी कार्य जैसे फैक्टरी में उत्पादन (प्रोडक्शन) इत्यादि तथा तृतीय - टर्सरी कार्य जैसे विभिन्न क्षेत्रों में सेवा, सोफ्टवेयर डवलपमेंट इत्यादि। हमेशा से ही प्राईमरी कार्य करने वालों की अपेक्षा सैकण्डरी एवं सैकण्डरी की अपेक्षा टर्सरी कार्यो में कम मेहनत व अघिक मुनाफा रहा है। फिर भी हमारे देश की अधिकतम जनसंख्या प्राईमरी कार्यो में ही लगी हुई है।
यदि आज के धनाढ्य लोगों पर नजर डाले तो पता चलता है कि या तो वह साफ्टवेयर डेवलपमेंट अथवा आई. टी. प्रोडक्ट या मार्केटिंग या निवेश इत्यादि टर्सरी गतिविधियों से ताल्लुक रखते हैं। परन्तु सभी में खासियत यह है कि वे अपने अपने क्षेत्र में अग्रणी है एवं उन्होंने विशेष इनोवेशन किया है।
प्रोफिट मार्जिन के एंगल से यदि चीजों को देखे तो पता चलता है कि प्राईमरी में सबसे कम एवं टर्सरी में सबसे अधिक होता है।
फिर क्यों नहीं लोग प्राईमरी की बजाय सैकण्डरी व टर्सरी कार्यों में जाते है? यह एक विचारणीय बिषय है।
यदि आर्थिक रूप से मजबूत बनना है तो हमें न केवल सैकण्डरी व टर्सरी कार्यो की ओर जाना होगा बल्कि उनमें पारंगतता हासिल करनी होगी। हमें इनोवेशन करने होगें, बुद्धि के प्रयोग से उत्पादों की गुणवत्ता को अति उत्तम बनाकर ब्राँड डेवलप करनी होगी। समाज को बिजनेस करने वालों व नौकरी की बजाय स्वमं के व्वसाय करने वालों को सम्मान व प्रोत्साहन देना होगा।
रघुवीर प्रसाद मीना।

Sunday, 27 May 2018

जाति कल्याण सकारात्मकता है जबकि जातिवाद नकारात्मकता का ध्योतक है।

rpmwu128
27.05.2018

जाति कल्याण सकारात्मकता है जबकि जातिवाद नकारात्मकता का ध्योतक है।
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हमारे देश की जनसंख्याॅ विभिन्न जातियों व जनजातियों में वर्गीकृत है। सरकार ने देश के आजाद होने से पूर्व 1931 में प्रथम जाति के आधार पर जनगणना करवाई थी। सरकार नें कुछ दिनो पूर्व भी इसी तरह की जनगणना करवाई थी परन्तु उसका रिजल्ट पब्लिकली आउट नहीं किया।
कई बार बात उठती है कि जाति की बात करना ही जातिवाद है। बहुत से लोग जाति का नाम लेने मात्र से ही डरते है। जाति के लोगो का न्यायपूर्ण कार्य करने में भी उन्हें डर लगता है। जाति के लोगो के साथ यदि गलत भी हो रहा हो तो वे अन्य लोगो के जातिवाद की मोहर लगाने मात्र के नाम से चुप रहते है।
पहले समझते है कि जाति के मायने क्या है? मूलतः जाति में लोग शादी ब्याह व अन्य रिश्तेदारियाँ करते है। जाति गौत्रों से मिलकर बनी है। तीन गौत्रों को छोडकर अन्य में व्यक्ति शादी करता है। गंभीर सहायता की आवश्यकता के समय व्यक्ति के परिवारजन, मित्र व रिश्तेदार (जो कि अधिकांश उसकी जाति के ही होते है) काम आते है। अत: व्यक्तिविशेष की भी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह भी उसके काम आने वाले लोगों के वक्त पडे़ काम आये। झिझके नहीं।
अब सोचो कि जब हम हमारी सैलेरी परिवार के लोगो को देते है तो क्या लोग परिवारवाद की मोहर लगाते है? नहीं ऐसा नहीं है। इसी प्रकार यदि हम हमारी जाति के लोगों को आगे बढ़ाने में सकारात्मक मदद करते है तो इसमें गलत क्या है? देश विभिन्न जातियों से बना है अतः जाति के लोगों की समझाईस करके उन्हें सही राह पर चलना सिखाना देश को आगे बढ़ाना ही है। यदि हरेक जाति में ऐसे लोग हो जाये तो देश के लिए अच्छा ही है।
मेरे मतानुसार जाति को बडा़ परिवार मानते हुए एक दूसरे को आगे बढ़ाने में मददगार साबित होना समझदारी है। लोगो को नेक सलाह दे। जो लोग ज्याद पैसे वाले हैं वे कम पैसे वाले की मदद करे, जो ज्यादा बुद्धिमान है कम ज्ञान वालों को सही दिशा दे, जो ज्यादा ताकतवर है वे कमजोर के रक्षक बने, जो लोग बडे़ पदो पर आसीन है वे छोटे कर्मियों की सहायता करे, उनका शोषण नहीं होने दे।
दुसरी जाति के लोगो के प्रति भी अच्छी सोच रखे, उन्हें दोस्त समझे, अनावश्यक निरर्थक गाली गलौच नहीं करें। उनकी न्यायपूर्ण उन्नति से खुश हो न कि दुखी। दूसरी जाति के प्रति दुर्भावना रखना जातिवाद है जबकि अपनी जाति की उन्नति हेतु सकारात्मक योगदान जाति कल्याण व देश हित है।
कृपया आप भी आपके बिचारो से अवगत करवाये।
रघुवीर प्रसाद मीना

Saturday, 14 April 2018

भारत रत्न बाबा सहाब डाॅ भीमराव अम्बेडकर के जीवन से सीखने योग्य महत्वपूर्ण बातें।

rpmwu126
14.04.2018

14 अप्रैल 2020 : भारतीय संविधान के निर्माता, अछूूतों और गरीबों के मसीहा, महििलाओं के उत्थानकर्ता, देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने वाले, बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर (14 अप्रैल 1891 से 6 दिसम्बर 1956) की जयंती पर देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं। बाबासाहब का जीवनकाल तो सामान्य मनुष्य की भांति 65 वर्ष का ही था परंतु उन्होंने अछूतों, गरीब, कमजोर, असहाय, महििलाओं और अर्थव्यवस्था के उत्थान के लिए 65 x 100 = 6500 वर्षों में हो सकने वाले कार्यो से भी कहीं अधिक कार्य किये।
भारत रत्न बाबा सहाब डाॅ भीमराव अम्बेडकर के जन्मदिवस के शुभ अवसर पर ऐसे महापुरुष को सत् सत् नमन व उनके जीवन से सीखने योग्य महत्वपूर्ण बातें।
1. उद्देश्य के प्रति समर्पण : जीवन में बड़ा उद्देश्य तय करें एवं विपरीत परिस्थितियों में आगे बढ़ने के लिए कठोर परिश्रम व लगन के साथ मुख्य तय उद्देश्य पर टिके रहने की आवश्यकता है। परेशानियों के आने पर उद्देश्य से नहीं भटकना चाहिए।
2. लीडरशिप : संविधान बनाते समय यदि कन्स्टिट्यूेन्ट असेम्बली में वे लीडर का रोल नहीं लेते तो जो वे चाहते थे वह संविधान में प्रविष्ट नहीं हो पाता। अत: जब भी टीम में काम करने का मौका मिले तो अग्रणी रोल रखने की जरूरत है।
3. स्पेशियलाईजेशन : अपने क्षेत्र में मेहनत व परिश्रम करके दक्षता हासिल करें ताकि दूसरे लोग उस क्षेत्र विशेष में आपका आदर करें।
4. निडरता : साईमन कमिशन के वक्त उनको देश द्रोही तक करार दे दिया गया व पूना पैक्ट से पूर्व जब गाँधी जी भूख हड़ताल पर थे तब लोगों ने उन्हें जान से मारने तक की धमकी दी थी। परन्तु वे कमजोर वर्ग के हित में उनकी माँगो पर अडिग रहे।
5. निस्वार्थता : पढाई के पश्चात बाबा साहब जब अमेरिका से वापस भारत लौट रहे थे तब उनको पता था कि भारत में उनके साथ कैसा व्यवहार होने वाला है, बडौदा में नौकरी करते वक्त रहने का ठिकाना तक नहीं मिल पायेगा और चपरासी भी पानी नहीं पिलायेगा। फिर भी देश व समाज सेवा के लिए वे भारत आये। सामान्य व्यक्ति भारत आने की बजाय पत्नि व बच्चों को अमेरिका ले जाता एवं आराम से इज्जत की जिंदगी जीता। परन्तु बाबा सहाब ने निस्वार्थता का परिचय दिया और उन्होंने समाज सेवा हेतु आराम को त्यागकर कठिनाई भरी राह चुनी।
6. पहचान नहीं छिपाई व अपने लोगों के साथ साथ कमजोर की वकालत : बाबा सहाब ने जीवन में कभी भी स्वयं की पहचान नहींं छिपाई, हमेशा कमजोर के जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश की। उन्होंने न केवल अछूतों बल्कि मजदूरों व महिलाओं के लिए क्रमशः निर्धारित ड्यूटी आवर्स व हिन्दू कोड बिल बनाया। पिछडो की उन्नति हेतु संविधान में आरक्षण सहित अनेक प्रावधान किये।
7. योग्यता के स्तर का काम : सामन्यतः व्यक्ति उनकी योग्यता से छोटा काम करते हैं क्योंकि वे कार्य उनको आसान लगते हैं। परन्तु सोचो यदि बाबाासाहब संविधान लिखने की वजाय उनकी जाति के लोगों की भांति सामान्य काम करने मेंं लग जाते तो क्याा होता? इस बात को ध्यान में रखते हुए पढ़े-लिखे और अनुुुभवी लोगों उनकी योग्यता व अनुभव के अनुरूप ही कार्य करने चाहिए। 
 8. बदले की भावना नहीं रखी: उनको जीवन में अनेको बार जाति के आधार पर घोर अपमान सहना पड़ा परन्तु उन्होनें कभी भी ऊँची जाति के लोगो को नुकसान नहीं पहुँचाया।
9. SCST : Work hard with full devotion and sincerity, learn skills and become masters in your areas, do not use Babasahab's name like carpet to hide your inefficiencies. 
10. Do not discriminate on the basis of caste, religion etc., try to understand back ground of a person. Software depends on upbringing. 
11. Remember face of Babasahab in any adversity, one can work to find solution. 
उक्त तो कुछ ही पहलू है उनके व्यक्तित्व को समराईज करना आसान नहीं है।
रघुवीर प्रसाद मीना

Sunday, 1 April 2018

देश की न्याय व्यवस्था में सुधार की सख्त व महत्ति आवश्यकता है।

rpmwu125
01.04.2018

हमारे देश में जातिप्रथा का प्रचलन आदिकाल से उच्च वर्ग कहे जाने वाले लोगों की स्वार्थ सिद्धी के कारण चला आ रहा है। देश में अधिकतर लोगों का इस संदर्भ में दौहरा चरित्र (hypocrisy) है । सामान्यत : हर व्यक्ति कहता है कि जातिवाद करना गलत है परन्तु जब जाती के आधार पर दिये गये आरक्षण व अन्य कानूनी प्रावधानों की बात आती है तो ऊँची कही जाने वाली जातियों के कई लोग इनका विरोध करते है एवं दूसरी ओर वे अंतर्जातिय विवाह इत्यादि की घोर खिलाफत भी करते है। ऐसे लोग उनके बच्चो की शादी दलित परिवारों में कदापी नहीं करते है एवं वे उनके अगले जीवन में दलित के घर जन्म लेने की सम्भावना तक से सहम जाते है।
देश की न्यायपालिका पर ऊँची कही जाने वाली जातियों के व्यक्तियों का ही कब्जा है एवं वे ही  आरक्षण व संविधान प्रदत्त अन्य प्रावधानों को कमजोर करते रहते है। उदाहरणार्थ -
1) नई भर्ती में न्यूनतम आरक्षण को अधिकतम सीमा (minimum representation को maximum limit या restriction) में बदल देने की कोशिश।
2) पदोन्नति में आरक्षण पर रोक।
3) SC/ST Act के प्रावधानों को कमजोर करने का निर्णय।
उच्च न्यायापालिका द्वारा उक्त बिषयों पर दिये गये अनेकों निर्णय इस बात के प्रमाण है कि देश की न्याय व्यवस्था में नकारात्मक जातिवाद की भरमार है एवं  निर्णय आरक्षित वर्ग के प्रतिकूल लिए जाते है।
वर्तमान व्यवस्था, न्यायपालिका में भर्ती के तरीके में बदलाव नहीं करने देना चाहती हैं। उच्च न्यायापालिका में चुनिंदा जातियों व परिवारों का ही बोलबाला रहा है।
दिनांक 02.04.2018 को होने वाले विरोध प्रदर्शन में पूरजोर माँग रखी जाये कि उच्च न्यायपालिका के चयन हेतु अख्तियार किये जा रहे वर्तमान सिस्टम को बदला जाये ताकि न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता व ईमानदारी आ सके।
हमें भारतीय प्रशासनिक सेवा की तर्ज पर उच्च न्यायपालिका में होने वाली भर्ती के तरीके को बदलवाने की जरूरत है ताकि उच्च व उच्चतम न्यायालयों में निष्पक्ष व बिना जातिवाद के वायरस से संक्रमित लोग पहुंचे जिससे लम्बी अवधि में वंचित व पिछड़ी जातियों के लोगो के हकों की रक्षा हो सके।
इस बिषय पर माननिय लोकसभा सांसद दौसा श्री हरीश चंद्र मीना द्वारा संसद में रखे गये पक्ष का विडियो नीचे लिंक में है, कृपया देखे व प्रण करे कि जब तक माँग पूरी नहीं हो जाती है हम लगातार संघर्षरत रहेगें।
https://youtu.be/T7e0Y29Ueik
रघुवीर प्रसाद मीना

Saturday, 31 March 2018

गम्भीर दुर्घटना से बचने के लिए यात्री को स्टेशन पर छोडने जाते समय कृपया रेल गाड़ी में नहीं चढ़े।

rpmwu124
31.03.2018

गम्भीर दुर्घटना से बचने के लिए यात्री को स्टेशन पर छोडने जाते समय कृपया रेल गाड़ी में नहीं चढ़े। दिनांक 30.03.18 को जयपुर के गाँधीनगर रेलवे स्टेशन पर अपनी बेटी को डबल डैकर ट्रेन में बिठाने के पश्चात चलती गाड़ी से उतरते वक्त एक व्यक्ति का बैलेंस बिगड गया और वह फिसल कर ट्रेन व प्लेटफार्म के बीच गिर गया जिससे उसके पैर गम्भीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गये। रेलवे स्टाॅफ ने पूर्ण समझदारी दिखाते हुए तत्परता से गाडी को रोका व घायल व्यक्ति को बहार निकालकर एम्बुलेंस के माध्यम से अस्पताल पहुँचाया।
अक्सर कई लोग ऐसी गलती सामान को एडजस्ट करने में मदद करने की बात कहकर करते है। पहले तो कम सामान लेकर यात्रा करे और यदि किसी कारणवश सामान ज्यादा व भारी हो तो कोच में यदि रेल कर्मी उपलब्ध है तो उसकी अथवा सहयात्रियों की मदद ली जा सकती है। आपके पैर व जिन्दगी बहुत ही कीमती है, कृपया लापरवाही नहीं बरते।
यदि अति अतिविशेष परिस्थितियों में व्यक्ति को कम स्पीड पर चलती गाड़ी से उतरना ही पड जाये तो उतरते समय मुँह व चलने की दिशा गाडी के चलने की दिशा में रखना चाहिए एवं उतरने के पश्चात गाड़ी के साथ साथ चलना या दौडना चाहिए ना कि एकदम रूकना।
निवेदन है कि जब भी आप अपने परिवार के सदस्यों , रिश्तेदारों या दोस्तो को छोडने (see off करने) रेलवे स्टेशन पर जाये तो कृपया गाड़ी में नहीं चढ़े।
साथ साथ जिस व्यक्ति को यात्रा करनी है उसकी भी नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह उसको छोडने आये व्यक्ति के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए उसे केवल सामान जमाने जैसे छोटे से काम के लिए गाड़ी में अन्दर प्रवेश नहीं करने दे।
आओ प्रण ले कि जब भी हम किसी प्रियजन को रेलवे स्टेशन पर छोडने जाये तो कोच में प्रवेश नहीं करेगें एवं यदि यात्री है तो छोडने आने वाले को गाडी में नहीं चढ़ने देंगे।
सतर्क आदतें ही संरक्षा है।
रघुवीर प्रसाद मीना
अपर मंडल रेल प्रबंधक (आॅपरेशंस)
जयपुर मंडल, उत्तर पश्चिम रेलवे।

Thursday, 28 September 2017

Know Your Parents (KYP)


rpmwu123
28.09.2017

One who loves till her eyes close, is a *Mother*.
One who loves without an expression in the eyes, is a *Father*.
____________________________
*Mother* - Introduces you to the world.
*Father* - Introduces the world to you.
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*Mother* : Gives you life
*Father*   : Gives you living
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*Mother* : Makes sure you are not starving.
*Father*  : Makes sure you know the value of starving
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*Mother* : Personifies Care
*Father*: Personifies Responsibility
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*Mother* : Protects you from a fall
*Father* : Teaches you to get up from a fall.
__________________________
*Mother* : Teaches you walking.
*Father* : Teaches you walk of life
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*Mother* : Teaches from her own experiences.
*Father* : Teaches you to learn from your own experiences.
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*Mother* :  Reflects Ideology
*Father* :  Reflects Reality
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*Mother's* love is known to you since birth.
*Father's* love is known when you become a Father.
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Dedicated to all parents.
Taken from whatsapp messages.

Thursday, 21 September 2017

Pin drop silence, worth reading! तीसरी घटना, साहस के साथ बोलने के लिए प्रोत्साहित करती है।

rpmwu122
21.09.2017

Can you hear a pin drop?
What is the meaning of pin drop silence?
Following are some instances when silence could speak louder than voice.
Take 1:
Field Marshal Sam Bahadur Maneckshaw once started addressing a public meeting at Ahmedabad in English.
The crowd started chanting, "Speak in Gujarati.  
We will hear you only if you speak in Gujarati."
Field Marshal Sam Bahadur Maneckshaw stopped.
Swept the audience with a hard stare and replied,
"Friends, I have fought many a battle in my long career. 
I have learned Punjabi from men of the Sikh Regiment;
Marathi from the Maratha Regiment;
Tamil from the men of the Madras Sappers;
Bengali from the men of the Bengal Sappers,
Hindi from the Bihar Regiment; and
Even Nepali from the Gurkha Regiment.  
Unfortunately there was no soldier from Gujarat from whom I could have learned Gujarati."...
You could have heard a pin drop
Take 2:
Robert Whiting,
an elderly US gentleman of 83, arrived in Paris by plane.
At French Customs, he took a few minutes to locate his passport in his carry on.
"You have been to France before, Monsieur ?", the Customs officer asked sarcastically.
Mr. Whiting admitted that he had been to France previously.
"Then you should know enough to have your passport ready."
The American said,
"The last time I was here,
I didn't have to show it."
"Impossible. 
Americans always have to show their passports on arrival in France !", the Customs officer sneered.
The American senior gave the Frenchman a long, hard look.
Then he quietly explained
"Well, when I came ashore at Omaha Beach,
at 4:40am, on D-Day in 1944, to help liberate your country, I couldn't find a single Frenchman to show a passport to.... "
You could have heard a pin drop
Take 3:
Soon after getting freedom from British rule in 1947, the de-facto prime minister of India, Jawahar Lal Nehru called a meeting of senior Army Officers to select the first General of the Indian army.
Nehru proposed, "I think we should appoint a British officer as a General of The Indian Army, as we don't have enough experience to lead the same."
Having learned under the British, only to serve and rarely to lead, all the civilians and men in uniform present nodded their heads in agreement.
However one senior officer, Nathu Singh Rathore, asked for permission to speak.
Nehru was a bit taken aback by the independent streak of the officer, though, he asked him to speak freely.
Rathore said, "You see, sir, we don't have enough experience to lead a nation too, so shouldn't we appoint a British person as the first Prime Minister of India?"
You could hear a pin drop.
After a pregnant pause, Nehru asked Rathore,
"Are you ready to be the first General of The Indian Army?"..
Rathore declined the offer saying "Sir, we have a very talented army officer, my senior, Gen. Cariappa, who is the most deserving among us."
This is how the brilliant Gen. Cariappa became the first General and Rathore the first ever Lt. General of the Indian Army.
(Many thanks to Lt. Gen Niranjan Malik PVSM (Retd) for this article.)