Saturday, 24 July 2021

डाॅ भीमराव अम्बेडकर : गुरु पूर्णिमा

rpmwu416 dt. 24.07.2021

गुरू_पूर्णिमा : मैंने भारतरत्न बाबासाहब डाॅ भीमराव अम्बेडकर की जीवनी, विचारधारा, मिशन, कार्यों व समर्पण को जानने हेतु अनेकों किताबें व दस्तावेज पढ़े है।अन्य दूसरे महान धार्मिक व राजनीतिक हस्तियों के जीवन व कार्यो के बारे में भी अध्यन किया है।

जब देश आजाद हो रहा था, जब संविधान बनाया जा रहा था और उसके पश्चात आजतक भी बाबासाहब डाॅ भीमराव अम्बेडकर के समान पढ़ालिखा व स्पष्ट सोच का धनी कोई भी व्यक्ति राजनैतिक गतिविधियों में जनहित के मुद्दों हेतु समर्पित नहीं था और न ही है।

मैं आज गुरु पूर्णिमा के अवसर पर बाबासाहब की विचारधारा व कार्यो के सामने नतमस्तक हूं। इस शुभ अवसर पर ऐसे महापुरुष के जीवन से सीखने योग्य महत्वपूर्ण बातों की समरी बनाना तो कठिन कार्य है तदापि एक प्रयास है। प्रमुख रूप से हर व्यक्ति, बाबा साहब के जीवनशैली व महान कार्यो से निम्नलिखित महत्वपूर्ण गुण सीख सकता है और उन्हें देशहित व जनहित हेतु विकसित करने की आवश्यकता है  -

1 शिक्षा : से व्यक्ति बहुत सम्मान पा सकता है व आगे बढ़ सकता है। स्वयं शिक्षा ग्रहण करें व दूसरों को शिक्षा ग्रहण करने में मदद करें। शिक्षा की सुविधाओं को महत्व देवे। ऐसी संस्थाओं से जुड़े जो गरीब व कमजोर छात्रों को शिक्षा ग्रहण करने में मदद करते है। 

2. समाधान : विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति समर्पण से बहुत आगे बढ़ सकता है। परेशानियों के स्थान पर समाधानों पर ध्यान दे। ऊंगलियों के बीच में होकर समाधान ढूंढे ना कि परेशानी। 

3. उद्देश्य के प्रति समर्पण : जीवन में बड़ा उद्देश्य तय करें एवं विपरीत परिस्थितियों में आगे बढ़ने के लिए कठोर परिश्रम व लगन के साथ प्रमुख रूप से तय किये गए उद्देश्य पर टिके रहने की आवश्यकता है। परेशानियों के आने पर उद्देश्य से नहीं भटकना चाहिए।

4. निस्वार्थता : पढाई के पश्चात बाबा साहब जब अमेरिका से वापस भारत लौट रहे थे तब उनको पता था कि भारत में उनके साथ कैसा व्यवहार होने वाला है, बडौदा में नौकरी करते वक्त रहने का ठिकाना तक नहीं मिल पायेगा और चपरासी भी पानी नहीं पिलायेगा। फिर भी देश व समाज सेवा के लिए वे भारत आये। सामान्य व्यक्ति भारत आने की बजाय पत्नि व बच्चों को अमेरिका ले जाता एवं आराम से इज्जत की जिंदगी जीता। परन्तु बाबा सहाब ने निस्वार्थता का परिचय दिया और उन्होंने समाज सेवा हेतु आराम को त्यागकर कठिनाई भरी राह चुनी। जनहित को स्वयं हित से ऊपर समझे। देश की उन्नति में बाधक कुप्रथाओं व रीति रिवाजों को सही करने लिये हिन्दू कोड बिल के प्रकरण पर उन्होंने केन्द्र सरकार के मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। 
 
5. निडरता : साईमन कमिशन के वक्त उनको देश द्रोही तक करार दे दिया गया व पूना पैक्ट से पूर्व जब गाँधी जी भूख हड़ताल पर थे तब लोगों ने उन्हें जान से मारने तक की धमकी दी थी। परन्तु वे कमजोर वर्ग के हित में उनकी माँगो पर अडिग रहे। अपने विचारों को प्रकट करने में डरे नहीं।

6. लीडरशिप : संविधान बनाते समय यदि कन्स्टिट्यूेन्ट असेम्बली में वे लीडर का रोल नहीं लेते तो जो वे चाहते थे वह संविधान में प्रविष्ट नहीं हो पाता। अत: जब भी टीम में काम करने का मौका मिले तो अग्रणी रोल में रहने की जरूरत है। कश्मीर के मुद्दे पर उनकी राय स्पष्ट थी कि कश्मीर को विशेष राज्य का स्टेटस नहीं दिया जाये। 

7. स्पेशियलाईजेशन : अपने क्षेत्र में मेहनत व परिश्रम करके दक्षता हासिल करें ताकि दूसरे लोग उस क्षेत्र विशेष में आपका आदर करें।

8. पहचान नहीं छिपाई व अपने लोगों के साथ साथ कमजोर की वकालत : बाबा सहाब ने जीवन में कभी भी स्वयं की पहचान नहींं छिपाई, हमेशा कमजोर के जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश की। उन्होंने न केवल अछूतों बल्कि मजदूरों व महिलाओं के लिए क्रमशः निर्धारित ड्यूटी आवर्स व हिन्दू कोड बिल बनाया। पिछडो की उन्नति हेतु संविधान में आरक्षण सहित अनेक प्रावधान किये।

9. योग्यता के स्तर का काम : सामन्यतः व्यक्ति उनकी योग्यता से छोटा काम करते हैं क्योंकि वे कार्य उनको आसान लगते हैं। परन्तु सोचो यदि बाबाासाहब संविधान लिखने की वजाय उनकी जाति के लोगों की भांति सामान्य काम करने मेंं लग जाते तो क्याा होता? इस बात को ध्यान में रखते हुए पढ़े-लिखे और अनुुुभवी लोगों उनकी योग्यता व अनुभव के अनुरूप ही कार्य करने चाहिए। 

10. बदले की भावना नहीं रखी: उनको जीवन में अनेको बार जाति के आधार पर घोर अपमान सहना पड़ा परन्तु उन्होनें कभी भी ऊँची जाति के लोगो को नुकसान नहीं पहुँचाया। धर्म परिवर्तन के समय भी देशहित का ध्यान रखा व  बदले की भावना नहीं रखी। यदि बौद्ध के अलावा किसी और धर्म को ग्रहण करते तो देश की राजनीति ही अलग हो जाती। 

11. आरक्षित वर्ग : आरक्षण देश के नागरिकों के समग्र विकास (inclusive growth) का एक महत्वपूर्ण टूल है। यदि आरक्षण नहीं होता तो देश को बहुत अधिक नुकसान होता। आरक्षण नहीं होने से देश में 3 स्थिति हो सकती थी। प्रथम दलितों, आदिवासियों व पिछड़े वर्गों का अलग देश बन जाता, द्वितीय अलग देश नहीं बन पाता तो देश में अत्याचारों के विरूद्ध दलित, आदिवासी व पिछड़ो के अधिकारियों के लिए गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनी रहती अथवा तृतीय यदि कुछ भी नहीं हो पाता तो एक बहुत बड़ी जनसंख्या उनकी क्षमता का सदुपयोग नहीं कर पाती। 

आरक्षित वर्ग के लोगों के जीवन का उत्थान हेतु आरक्षण का प्रावधान बाबासाहब की परिकल्पना से ही संभव हो पाया। अतः आरक्षित वर्ग के हर व्यक्ति की जिम्मेदारी बनती है कि वह कड़ी मेहनत के साथ सम्पूर्ण निष्ठा व लगन से कार्य करे। व्यक्ति को उसके कार्य क्षेत्र में महारत हासिल करनी चाहिए , नई नई स्किल सीखनी चाहिए। कभी भी स्वयं की कमियों व इनएफ़्फीसिएन्सी को छुपाने के लिए बाबासाहब का नाम कारपेट की भाँति उपयोग में नहीं लें। 

12. भेदभाव नहीं करें : जाति व धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करें। दूसरे व्यक्ति के बैकगॉउन्ड को समझे, व्यक्ति के मस्तिष्क का सॉफ्टवेयर उसके पालनपोषण पर निर्भर करता है।

13. विषमता के समय बाबासाहब को याद करें : जब भी ख़राब परिस्थिति हो तो बाबासाहब व उनके जीवन की कठिनाईओं और उनके संघर्ष को याद करेें, समाधान अवश्य मिल जायेगा।  

14. बाबासाहब का सर्वाधिक महत्वपूर्ण नारा : 
शिक्षित बने, संगठित रहे और संघर्ष करें को याद रखे व इसका जीवन में अनुसरण करें।

15. माँ जैसा रोल : जनहित के प्रमुख उद्देश्यों के लिए दाई की बजाय माँ की भांति काम करें।

16. दूसरों को गलत करने से रोके : अस्पृश्यता को समाप्त करवा कर उन्होंने दूसरों को और अधिक पाप करने से रोका। यदि कोई गलत या अत्याचार कर रहा है तो उसे गलत करने से रोकना चाहिए। 
 
ये तो कुछ ही पहलू है उनके व्यक्तित्व को समराईज करना आसान नहीं है। जरुरत है कि बाबासाहब के महान व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर हम सभी अपने अपने कार्य को सही तरीक़े से पूर्ण क्षमता व एफिसिन्सी के साथ निष्पादित करें। साथ में दूसरों की आवश्यकताओं का भी ध्यान रखें और यथासंभव सभी देशवासियों को प्रसन्न रखने का प्रयत्न करें। इतिहास की ज्यादा खोजबीन करने की बजाय वर्तमान व भविष्य पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। बाबासाहब के द्वारा लिखे गए दस्तावेजों व किताबों को पढ़े और उनसे प्रेरणा ले। Cultivation of mind should be the ultimate aim of human existence. Small minds discuss people, medium minds talk of events and great minds ponder over ideas. Implementation of the provisions of the constitution is extremely important for the welfare of the citizens, we all must individually and collectively strive for the same.

जय भीम
रघुवीर प्रसाद मीना

Tuesday, 20 July 2021

श्री प्रभु लाल देवन्द सर - गुणवत्तायुक्त जीवनमूल्यों से ओतपोत्र व्यक्तित्व एवं अरावली विचार मंच के प्रधान पैट्रन (संरक्षक)

(05-07-1944 से 17-07-2021, 77 वर्ष 12 दिन) 
श्री प्रभु लाल देवन्द (से.नि.मेजर) भारतीय रेलवे की इंडियन रेलवे सर्विसेज ऑफ़ मैकेनिकल इंजीनियर के 1971 बैच के बेहद सफल व तकनीकी ज्ञान से परिपूर्ण अधिकारी रहे। उनके गौरवपूर्ण सेवा काल के दौरान उन्होंने रेलवे के अनेकों महत्वपूर्ण संस्थानों यथा पश्चिम रेलवे, मुंबई, अनुसंधान, डिजाइन एवं मानक संगठन (आरडीएसओ), लखनऊ, पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे, गुहाटी, रेलवे रिक्रूटमेंट बोर्ड, अजमेर  व उत्तर पश्चिम रेलवे, जयपुर में मुख्य कारखाना प्रबंधक, लोअर परेल वर्कशाप, मुम्बई, चैयरमेन रेलवे रिक्रूटमेंट बोर्ड, अजमेर, अपर मंडल रेल प्रबंधक, जयपुर तथा चीफ़ वर्कशॉप इंजीनियर, पश्चिम रेलवे, चर्चगेट,मुम्बई व उपरे, जयपुर के सम्मानित व विशिष्ट पदों पर सफलता पूर्वक दक्षतापूर्ण कार्य किया और वे वर्ष 2004 में सेवानिवृत्त हुए। रेल इंडिया टेक्नीकल एंड़ इकोनॉमिक सर्विसेज (राइट्स) के प्रोजेक्ट्स में डीज़ल लोको के संचालन व रखरखाव हेतु अफ्रीकी देशों में भी भारतीय रेल के साथ देश का नाम रोशन किया। श्री प्रभु लाल देवन्द सर ने जीवन के हर क्षेत्र में गुणवत्ता व सिस्टम्स पर बहुत महत्त्व दिया। जयपुर मंडल में आईएसओ लगाने की बात हो या  रेलवे रिक्रूटमेंट बोर्ड, अजमेर की छबि को सुधारने का मसला हो या आरडीएसओ में विभिन्न डिजाइनों से सम्बंधित मसले हो, उनके योगदान को हमेशा याद रखा जायेगा।

श्री देवन्द साहब का मानना था कि सेवानिवृत्ति के पश्चात व्यक्ति थर्ड लाइफ (तीसरी जिंदगी) जीता है जिसमें वह बहुत पॉवरफुल होता है क्योंकि उसके पास समुचित समय, धन व अनुभव से परिपूर्ण होता है। उनकी थर्ड लाइफ में उन्होंने हैल्थ व वेलनेस के क्षेत्र में जनहित के लिए जोरदार उदाहरणार्थ कार्य किया। देवन्द साहब विभिन्न विषयों पर बहुत सारी किताबें पढ़ते थे और हमेशा नई चीजें सीखने में विश्वास रखते थे। सेवानिवृत्ति के पश्चात् दौड़ने की टेक्निक सीखी और उन्होंने अनेकों बार 42 किलोमीटर की मैराथन दौड़ न केवल पूर्ण की अपितु उनकी कैटेगरी में प्रथम स्थान पर भी आये। उनके मोटिवेशन से अनेको युवा मित्रों ने भी मैराथन दौड़ना प्रारंभ की और जिसे गर्व के साथ पूर्ण करते रहे। मैराथन जैसी कठिन दौड़ को सरलता से पूर्ण करने हेतु श्री प्रभु लाल देवन्द सर द्बारा बताई गई टिप्स व टेक्निकस् को याद करते हुए वे सभी अपने आप को उनके सानिध्य प्राप्त होने के लिए बेहद सौभाग्यशाली समझते है। श्री देवन्द साहब ने खुले दिल से सभी को अपना पोस्चर सही रखने, श्वास लेने की सही विधि, बैलेंस्ड डाइट इत्यादि के बारे में आगे से जाकर जानकारी देकर लाभान्वित किया। शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक बैलेंस व नैतिक मूल्य बेहतर करने हेतु उन्होंने जीवन विद्या की पद्धति को पहले स्वयं सीखा और फिर दूसरों को उसके प्रति उत्साहित किया। अनेकों लोगों को मेन्टरिंग के माध्यम से श्री देवन्द साहब ने जीवन की राह में गाईड किया। वे चाहते थे कि मेन्टरिंग को व्यवस्थित तरीके से अपनाकर बड़े स्तर पर लोगों का भला किया जाये ताकि बेहतर समाज का सृजन हो सके।

देश के आदिवासियों के लिए एक कल्याण व उत्थान हेतु थिंक टैंक विकसित करने के उद्देश्य से आदिवासी अधिकारियों व समकक्ष की सामाजिक संस्था अरावली विचार मंच की सन् 2003 में स्थापना की। श्री प्रभु लाल देवन्द अरावली विचार मंच के प्रथम आजन्म संरक्षक एवं अध्यक्ष थे। जब संस्था का रजिस्ट्रेशन हुआ था उसी वक्त उन्होंने रू. 15000/- का आशान्वित सहयोग देकर, वे आजन्म संरक्षक के रूप में सदस्यता ग्रहण करने वाले केवल एकमात्र व्यक्ति थे। अरावली विचार मंच के प्रत्येक उद्देश्य को निर्धारित करने मेंं श्री देवन्द साहब ने बहुत सोच-विचार, ऊर्जा व समय लगाया। प्रमुख रूप से अरावली विचार मंच के निम्नांकित उद्देश्य तय किये गए - 
1. सदस्यों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए उनके बीच आपसी सहयोग के आधार पर भ्रातृत्व भाव विकसित करना व उनके व्यक्तित्व निर्माण हेतु      विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन तथा उनकी समस्याओं के निदान हेतु प्रयत्न करना।
2. सदस्यों में देश प्रेम, आत्मविश्वास, स्वाभिमान तथा मानवीय गुणों का सर्वांगीण विकास करना।
3. समाज में व्याप्त सामाजिक कुरीतियों जैसे बालविवाह, दहेज प्रथा, नशाखोरी आदि से मुक्त होने हेतु कार्यक्रम बनाना व जागरूकता उत्पन्न करना।
4. समाज में बालिकाओं के स्वास्थ्य व शिक्षा को प्रोत्साहन देना, प्रौढ़ शिक्षा का प्रसार करना व सीमित परिवार अपनाने हेतु लोगों को जागरूक करना।
5. बुजुर्गों के प्रति सम्मान एवं उनके प्रति सामाजिक उत्तरदायित्वों का निर्वहन करना।
6. कमजोर वर्ग के हितों की रक्षा के लिए व्यवस्था में व्याप्त कमजोरियों को उजागर करना तथा सामाजिक न्याय दिलवाने के लिए कार्य योजना बनाना        तथा क्रियान्वयन करना।
7. सेवाभावी, सेवानिवृत्त प्रतिभाओं को संगठित करना तथा उनके माध्यम से युवा वर्ग की प्रच्छन्न प्रतिभा एवं शक्तियों के रचनात्मक मार्गदर्शन हेतु नेटवर्क      बनाना तथा क्रियान्वयन करना।
8. बच्चों, महिलाओं, अपंग-अपाहिजों तथा कमजोर वर्ग के लोगों के सशक्तिकरण के लिए प्रयत्न करना।
9. समान विचारधारा वाले व्यक्तियों /समूहों से विचारों का आदान-प्रदान करना ।
10. खेलकूद व अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करना।
11. समाज की होनहार प्रतिभाओं का उचित मार्ग दर्शन एवं सम्मान करना व उनमें से निर्धनों को आर्थिक सहायता देना।
12. पर्यावरण संरक्षण व संवर्धन करना।
कालांतर में अरावली विचार मंच को उन्होंने एक छोटे पौधे से पेड़ बनाने में अतिविशेष योगदान दिया। सदस्यों में आपस में सकारात्मक संवाद व सहकारिता कायम करने में उनकी विशिष्ट भूमिका रही। श्री प्रभु लाल देवन्द, प्रधान पैट्रन (संरक्षक) के सानिध्य व दिशानिर्देशों में अरावली विचार मंच आदिवासियों के कल्याण से संबंधित मामलों में हमेशा सक्रिय रहा। राजस्थान में एक जाति विशेष के उग्र आंदोलन व अनुचित दबाव के कारण उसको एसटी में शामिल करने पर विचार करने के लिए गठित चोपड़ा समिति को महत्वपूर्ण दस्तावेज, सूचना और गवाह प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मीना-मीणा मुद्दे को समझाने हेतु दूसरी सामाजिक संस्थाओं के साथ मिलकर दस्तावेज़ एकत्रित किये, प्रेजेंटेशन दिए, सेमिनार व मीटिंग्स आयोजित करवाई जिससे जनता, नेताओं, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और सरकार को इस मुद्दे को सही रूप से समझने में मदद मिली। स्वदेशी लोगों के अधिकारों से संबंधित मुद्दों के प्रति जनजागृति हेतु अंतर्राष्ट्रीय विश्व आदिवासी दिवस के उत्सव को बड़े स्तर पर वर्ष 2015 से लगातार सेलिब्रेट करके लोकप्रिय बनाया। देश की जनजातियों को एकजुट करने के लिए जयपुर में "अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद" की राष्ट्रीय स्तर की बैठक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों को आयोजित करवाने का प्रबंधन संभाला। सदस्यों के परिवार मिलन आयोजनों से महिला सशक्तिकरण के साथ सामाजिक मुद्दों पर अनेकों परिचर्चा की। आर्थिक रूप से कमजोर 24 आदिवासी छात्र-छात्राओं को 12000/- रुपये प्रति वर्ष की आर्थिक सहायता प्रदान की। 10वीं या 12वीं में 80% या उससे अधिक अंक प्राप्त करने वाले 142 प्रतिभाशाली आदिवासी छात्र-छात्राओं को योग्यता प्रमाण पत्र और नकद पुरस्कार से सम्मानित करके उन्हें प्रोत्साहित किया। गरीब आर्थिक पृष्ठभूमि वाली आदिवासी छात्राओं के लिए प्रताप नगर, जयपुर में छात्रावास के निर्माण हेतु अरावली विचार मंच के सदस्यों द्वारा लगभग 28 लाख रु. का वित्तीय सहयोग स्वयं किया तथा लगभग 36 लाख का सहयोग दूसरे समाज सेवा का भाव रखने वाले महानुभावों व संस्थाओं से प्रदान करवाने में अहम भूमिका निभाई। सामूहिक विवाह सम्मेलनों को बढ़ावा देने के लिए 3 स्थानों पर रू. 83000/- का योगदान दिया। 13/200 पॉइन्ट रोस्टर को समझने के लिए जागरूकता कार्यक्रमों की व्यवस्था की। समय समय पर सामाजिक मुद्दों पर जनजागृति हेतु पत्रिकाएं प्रकाशित की जाती रही। हाल ही में श्री देवन्द साहब की पहल से 3 ई_पत्रिकाएँ 1.जनजातीय समाजों को सशक्त बनाना 2. जनजातीय सशक्तिकरण 3. जनजातीय नेताओं का योगदान प्रकाशित की गई जो कि बेहद जनप्रिय हुई। कोविड़-19 सर्वव्यापी महामारी के समय जरूरतमंद लोगों के लिए भोजन और राशन के पैकेट वितरण के साथ-साथ मुख्यमंत्री कोविड-19 मिटिगेशन कोष में 5 लाख रु. का सहयोग प्रदान किया गया।

श्री प्रभु लाल देवन्द सर को हर व्यक्ति एक सकारात्मक सोच रखने वाला, सिस्टेमेटिक कार्यशैली, जीवन के हर पहलू में गुणवत्ता, दृढ़ संकल्पी, आमजन के लिए मददग़ार, महिला सशक्तिकरण के पुरजोर समर्थक, विश्वास करने योग्य अग्रज, स्वास्थ्य के प्रति जागरूक व्यक्तित्व के रूप में हमेशा याद रखेगा। हम सभी उनकी दिवंगत आत्मा की शांति के लिए कामना करते हुए उनके सपनों व  विचारों को साकार करने के प्रयास करेंगे। ॐ नमः शिवाय। 

सादर
रघुवीर प्रसाद मीना,
मुख्य यांत्रिक इंजीनियर, भारतीय रेलवे
एवं महासचिव, अरावली विचार मंच।
rpmwu415 dt. 19.07.5021

Wednesday, 14 July 2021

पंचो के प्रति कृतज्ञ रहे व उनका आदर करें।

rpmwu414 dt. 14.07.2021

#Life_lesson आज पंच शब्द का जोरदार अर्थ मिला है। साधारणतया पंचों की राय का मतलब माना जाता है कि पांच महानुभावों की राय। परन्तु प्रकृति के पांच तत्व अर्थात् पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि व आकाश ही असली #पंच है।

यदि मनुष्य वास्तव में सस्टेनेबल डवलपमेंट चाहता है तो उसे प्रकृति के इन पांच पंचों की परवाह व आदर करना होगा। इनके प्रति कृतज्ञता का भाव रखना ही मनुष्यता है। इन पंचों को अंधाधुंध नुकसान पहुंचाने से समस्त मानव सभ्यता खतरे में पहुंच कर विलुप्त भी हो सकती है।

#respectthe5elements

Regards
Raghuveer Prasad Meena 

Tuesday, 13 July 2021

अपने मष्तिष्क को तिजोरी की तरह प्रयोग में ले न कि डस्टबीन की भांति।

rpmwu413 dt.13.07.21

#Life_lesson व्यक्ति यदि उसके मन मष्तिष्क में लम्बे समय तक क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, बदले की भावना, दूसरों को दूखी करने की सोच, संकुचित व दकियानूसी विचारधारा या धार्मिक अंधविश्वास के प्रदूषण (#DAP) जैसे नकारात्मक भाव रखता है तो वे डस्टबीन में रखे कचरे के समान सड़ने लगते है जिनकी बदबू उसके व्यक्तित्व व व्यवहार में परिलक्षित होती है। ऐसे लोग स्वयं को ही सबसे अधिक नुकसान करते है और दूसरों के प्रति भी उनका नजरिया संकीर्ण हो जाता है। अत: अपने मन मष्तिष्क में नकारात्मक भावों को लम्बे समय तक नहीं रहने दिया जाये।

व्यक्ति को मन में हमेशा दूसरों के प्रति सद्भाव, सहयोग तथा कल्याण की सोच रखनी चाहिए। आप 2 उन घटनाओं को याद करो जब आपके साथ किसी ने अच्छा व्यवहार किया हो या आपकी सहायता की हो एवं इसी तरह 2 उन अवसरों को याद करो जब आपने दूसरों की मदद की हो। ये दोनों स्थितियां आपको प्रसन्नता प्रदान करेंगी। इनके विपरीत नुकसान करने की घटनाओं की याद आपके मन को क्षुब्ध कर देगी।

हमेशा याद रखे कि हमारा मष्तिष्क कचरे रखने वाली डस्टबीन नहीं है। उसे अच्छे सद्विचार व सद्भाव विकसित करने की तिजोरी की रूप में काम में ले।

सादर
रघुवीर प्रसाद मीना

Monday, 12 July 2021

उतना ही ले थाली में, व्यर्थ न जाये नाली में। अन्न का आदर करें, बर्बाद नहीं करें।

         rpmwu412 dt.12.07.2021

#Life_lesson अन्न उत्पन्न करने में बहुत अधिक मेहनत व संसाधन खर्च होते है। पता होना चाहिए कि #1_किलो_गेहूं पैदा करने में लगभग #800_लीटर_पानी खर्च होता है। राजस्थान में एक बीघा भूमि का आकार 165 फीट x 165 फीट यानी 27225 वर्गफीट अर्थात 3025 वर्गगज या 2529.285 वर्गमीटर होता है। गेहूं पैदा करने के लिए खेत की न्यूनतम 5 बार सिंचाई करनी पड़ती है। एक बार की सिंचाई में 3 इंच पानी की आवश्यकता को समझे तो एक बीघा में गेहूं पैदा करने के लिए 5 बार सिंचाई हेतु 9.64 लाख लीटर पानी की जरूरत रहती है और पैदावार होती है लगभग 30 मण यानी 1200 किलो। इन आंकड़ों से प्रति किलो गेहूं के लिए 803 लीटर पानी की आवश्यकता निकलती है। जहां पैदावार कम या ज्यादा है ये आंकड़ा तदनुसार बदल सकता है। इसके अलावा खेतो की जुताई का खर्च, खाद (देशी, डीएपी व यूरिया), बीज, किसान की मेहनत, मजदूरों की लागत व ओले, टिड्डी इत्यादि का रिस्क अलग है। 

दूसरी ओर संसार में अाज भी अनेकों लोगों को दिन में भरपेट खाना नहीं मिलता है।

हर समझदार व्यक्ति को चाहिए कि खाने को बिलकुल भी बर्बाद नहीं करें। जितना चाहिए थाली में उतना ही ले। अनावश्यक खाने से भी व्यक्ति बीमारियों से ग्रसित होता है, खाने के साथ दवाईयों पर बेवजह खर्च करना पड़ता है।

सादर
Raghuveer Prasad Meena


Sunday, 11 July 2021

विनम्रता के साथ वैज्ञानिक सोच विकसित करके आगे बढ़े।

rpmwu411 dt 11.07.2021

#Life_lesson अनेकों देश व लोग जो आज विकास की राह में बहुत पीछे है वे उनके पुराने दिनों पर गर्व करते हुए भ्रम में रहते है और काफी अधिक समय वे भूतकाल की बातों में ही नष्ट करते रहते है। आवश्यकता है कि आज व भविष्य की स्थितियों पर अधिक समय व ऊर्जा लगाई जाये।

Small minds discuss people in their absence. 
Medium minds discuss events of the past. 
Great minds discuss ideas to progress ahead.

यदि वास्तव में आगे बढ़ना है तो भूतकाल को यथार्थ में समझकर वर्तमान व भविष्य पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। विनम्रता (humility) के साथ सभी को सम्मान देते हुए आगे बढ़ने की वैज्ञानिक सोच विकसित करें।

सादर
Raghuveer Prasad Meena

Saturday, 10 July 2021

भ्रष्टाचार का पेड़

rpmwu410 dt. 10.07.2021

#goodwork  ACB Rajasthan has been doing real commendable job by nabbing a lot of corrupt public servants.

वैसे तो हर प्रकार का भ्रष्टाचार गलत है परन्तु अपोइंटमेंट के समय रिश्वत लेना भ्रष्टाचार का पेड़ लगाने जैसा है। इस प्रकार का भ्रष्टाचार देश के नागरिकों व सिस्टम के लिए दीर्घकालिक नुकसान को जन्म देता है। क्योंकि सामान्यतः जो व्यक्ति रिश्वत देकर नौकरी लगता है वह उसके जीवन में जरूर ही भ्रष्ट बनेगा, वह उसके द्वारा भुगतान की गई राशी को जल्दी से जल्दी वसूलना चाहेगा। ऐसे रिश्वतखोरों की वजह से ईमानदार व योग्य कैंडिडेट्स को भी भारी नुकसान होता है।

आवश्यकता है कि नौकरी लगाने के नाम पर होने वाले हर प्रकार के धोखे व भ्रष्टाचार पर और अधिक नकेल कसी जानी चाहिए ताकि ईमानदार व योग्य कैंडिडेट्स के साथ न्याय हो सके तथा कालांतर में सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार कम हो और देश के नागरिकों के लिए सरकारी फण्डस् का सही सदुपयोग हो। 

सादर
Raghuveer Prasad Meena

Sunday, 4 July 2021

भ्रष्टाचार बन रहा है उत्प्रेरक अंधविश्वास व धार्मिक क्रिया-कलापो को बढ़ाने में। सीधे-साधे लोग होड़ में लुट रहे है व नहीं कर रहे है जनहित के कार्यों में आर्थिक सहयोग।

 भ्रष्टाचार बन रहा है उत्प्रेरक अंधविश्वास व धार्मिक क्रिया-कलापो को बढ़ाने में। सीधे-साधे लोग होड़ में लुट रहे है व नहीं कर रहे है जनहित के कार्यों में आर्थिक सहयोग। [rpmwu409 dated 04.07.2021]

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यह देखने में आया है कि अंधविश्वास व धार्मिक क्रिया-कलाप जैसे कथा, भागवत, यज्ञ इत्यादि में कई लोग बहुत अधिक धन ख़र्च कर देते है। यज्ञ की मुख्य कुण्डी पर बैठने हेतु लाखों रू. तक की बोली लगती है। कथा-भागवतों के कार्यक्रमों में भी कथा वाचक व उसके सहयोगी लाखों रू. एकत्रित करके ले जाते है।
अब यह देखे कि कौन लोग है जो इस प्रकार के आयोजनो में अधिक धन ख़र्च करते है? अनुभव व आम लोगो से हुई बातचीत के अनुसार भ्रष्टाचार से धन कमाने वाले अधिकतर लोग इन प्रोग्रामों को ज्यादा करवाते है। इसका कारण यह भी बताया जाता है कि ऐसे लोग यह समझते है कि इस प्रकार के कार्यक्रमों के आयोजन से भ्रष्टाचार करने से हुए पाप कम हो जायेंगे।
भ्रष्टाचार में लिप्त इस प्रकार के लोगो से प्रभावित होकर या होड़ में कई अंधविश्वासी लोग भी ऐसे आयोजनो में मेहनत से कमाये धन को भी नष्ट करते है। जब सामाजिक महत्व व गरीब के हित के कार्य जैसे कन्या छात्रावास के निर्माण या गरीब होनहार बच्चे की पढ़ाई में आर्थिक सहयोग के लिए उनसे बात करते है तो वे विभिन्न प्रकार के बहाने बनाते है व सहयोग नहीं करते है।
इस प्रकार के अंधविश्वास पर भ्रष्टाचार से कमाये गये धन को ख़र्च करने से समाज को निम्न चार प्रकार के नुकसान प्रमुखत: है-
1. भ्रष्टाचार करने के कारण आम आदमी (कॉमन मेन) को डॉयरेक्ट या इनडॉयरेक्ट हानि व परेशानी। जो व्यक्ति भ्रष्टाचार का शिकार होता है वह भी फिर भ्रष्टाचार करके धन कमाने का प्रयास करता है। इस प्रकार यह भ्रष्टाचार का एक कुचक्र बन जा रहा है जिससे देश की जनता परेशान हो रही है व देश की छवि पर भयंकर विपरीत असर हो रहा है।
2. ऐसे लोगो की होड़ में या उनसे प्रभावित होकर सामान्य लोग भी इन कथा, भागवत व यज्ञों में लुट रहे है। वे अंधविश्वासी व कम साहस वाले बनते जा रहे है।जिससे देश व समाज सभी को नुकसान है।
3. जब लोग इन धार्मिक प्रपंचों में धन व्यर्थ कर देते है तो उनके पास अच्छे कार्यों में सहयोग के लिए धनराशि नहीं बचती है। इससे सामाजिक उत्थान के कार्यों की मात्रा व गति दोनों ही कम हो जा रही है।
4. एक और नुकसान यह है कि कथा-भागवत, यज्ञ इत्यादि करने वाले लोगो की संख्यॉ बढ़ती जा रही है। क्योंकि उनको कमाई का बहुत ही सरल साधन मिल जा रहा है। ये लोग नॉन-प्रोडक्टिव और कहे तो अंधविश्वास फैलाने वाले नकारात्मक कार्य में लिप्त हो जा रहे है। यदि लोग इनके कार्यों को प्रोत्साहित नहीं करगें तो ये बुद्धिमान लोग देश हित के सकारात्मक कार्य कर सकेंगे।

यदि धन से वास्तव में मानवता की भलाई ही करनी हो तो गरीब होनहार बच्चों की पढ़ाई , छात्रावासों के निर्माण,  शारीरिक रूप से कमज़ोरों को उनकी हैल्थ सुधारने या ग़रीब-बेसहाराओं को उनके हक़ दिलाने में मदद करे। ज़रा सोचो कि शुभ कार्य या खुशी के मौक़े पर किसी ने #DAP (धार्मिक अंधविश्वास के प्रदूषण) के कार्यो की बजाय किसी गरीब होनहार बच्चे की पढ़ाई में मदद करने का कार्य किया हो और वह बच्चा बड़ा होकर योग्य इंसान बन जाये तो कालांतर में इस बात से कितना अच्छा लगता रहेगा।


कृपया उक्त का अवलोकन कर अपने विचारों से अवगत कराये। साथ ही कथा-भागवत व यज्ञ इत्यादि के स्थान पर और क्या क्या जनहित के सामाजिक कार्य करवाये जा सकते है उनके बारे मे भी बताये।

सादर 
रघुवीर प्रसाद मीना