Saturday, 5 June 2021

विश्व पर्यावरण दिवस 2021 : मैं स्वयं क्या कर सकता हूँ ? पर्यावरण संरक्षण हेतु माँ की तरह काम करे ना कि दाई की भांति सलाह दे।

rpmwu386 dt 05. 06. 2021 

            विश्व पर्यावरण दिवस पर बड़ा प्रश्न है कि पर्यावरण संरक्षण में मैं स्वयं क्या कर सकता हूँ ? 

पर्यावरण संरक्षण हेतु माँ की तरह काम करे ना कि दाई की भांति सलाह दे।

            विश्व पर्यावरण दिवस सन 1972 के पश्चात हर वर्ष मनाया जाता है। इस दिन पर्यावरण का महत्त्व व उसका संरक्षण मुख्य फोकस रहता है। पर्यावरण संरक्षण मनुष्य के स्वयं के अस्तित्व की आवश्यकता है। यक्ष प्रश्न है कि आख़िर पर्यावरण ख़राब क्यों होता है? पर्यावरण को बिगाड़ने में जानवरों व पशु पक्षियों का कोई हाथ नहीं है, केवल मनुष्य ही उसकी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्तिओं के लिए अनेकों उत्पादों के उत्पादन व सेवाओं के संचालन हेतु ऊर्जा का उपयोग करता है और इसी क्रम में पर्यावरण ख़राब होता है। हमारे देश में वर्ष 2017 के आंकड़ों के मुताबिक लगभग 70% ऊर्जा की आवश्यकता की आपूर्ती कोयले एवं पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स से होती है। शेष 30% ऊर्जा की आपूर्ति बायोफुएल, नेचुरल गैस, हाइड्रो, सोलर, विंड, न्यूक्लेयर इत्यादि संसाधनों से होती है। कोयले एवं पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स में अधिकांशतय: कार्बन होता है जो कि एक बहुल लम्बे कालांतर में ज़मीन के अंदर प्राकृतिक कारणों से दफ़ना हुआ है। ऊर्जा के इन स्त्रोतों से ऊर्जा प्राप्त करने हेतु कोयले एवं पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स (डीजल, पेट्रोल एटीफ इत्यादि) को ज़मीन से बाहर निकलकर उनका ट्रांसपोर्टेशन कर उन्हें जलाना होता है ताकि उत्पन्न ऊर्जा से विभिन्न प्रकारों के उत्पाद व सेवाओं उत्पादन/संचालन हो सके। किसी भी भोग विलास या आजकल तो अधिकांश को आवश्यकता कह सकते है, की वस्तुओं में काम आने वाले उत्पादों यथा बिजली, स्टील, सीमेंट, रोड व हाईवे कंस्ट्रक्शन, काम आने की शेप में पत्थर, मोबाइल्स, टेलीविज़न, कम्प्यूटर्स , पेपर, इलेट्रॉनिक आइटम्स, ग्लास, कपड़े, बड़े पैमाने पर खाने की वस्तुएं इत्यादि को बनाने के लिए ऊर्जा अर्थात बिजली या हीट की आवश्यकता होती है जो कि अधिकांशतय कोयले एवं पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स के प्रयोग से उत्पादित होती है। परन्तु इसी के साथ यह भी जान लेना आवश्यक है कि 1 लीटर डीजल की खपत से 2.86 किलोग्राम तथा 1000 यूनिट बिजली के उत्पादन में 0.82 टन कार्बनडाइऑक्सइड का क्रमशः वातावरण में विसर्जन होता है जो कि पर्यावरण के प्राकृतिक संतुलन को ख़राब करती है। 

            सयुंक्त राष्ट्र संघ, अन्तर्रष्ट्रीय एवं राष्ट्रिय स्तर पर सभी देश आपस में तय मापदंडों के अनुसार पर्यावरण संरक्षण की दिशा को ध्यान में रखकर विकास कार्य करते रहते है। हमारे देश की भी लगातार कोशिश है कि ऊर्जा के अक्षय स्त्रोतों का अधिकाधिक प्रयोग करें। अक्षय स्त्रोतों जैसे हाइड्रो, सोलर, विंड, न्यूक्लेयर इत्यादि से बिजली उत्पादन को राष्ट्रिय स्तर पर विशेष महत्व दिया जा रहा है ताकि कार्बनडाइऑक्सइड का उत्सर्जन कम हो और पर्यावरण शुद्ध रहें। साथ ही सरकार ऐसे उत्पादों पर विशेष प्रोत्साहन देती है जिनके उत्पादन व प्रयोग में कम ऊर्जा खर्च हो। परन्तु कुछ देश ऐसे है जो पर्यावरण ख़राब होने को महसूस तो करते है परन्तु स्वयं पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कम काम करते है, केवल चिंता व्यक्त करते है और दूसरों को पर्यावरण संरक्षण सलाह देते रहते है। पर्यावरण के संरक्षण के लिए वास्तव में काम करने वालों एवं केवल सलाह देने वालों में बच्चा होते समय माँ के द्वारा की जाने वाली कोशिश और दर्द एवं दाई द्वारा महसूस दर्द व सलाह के सामान अंतर होता है।       

             सयुंक्त राष्ट्र संघ, विभिन्न देश, प्रदेश, शासन, प्रशासन पर्यावरण संरक्षण हेतु अपने अपने स्तर पर कार्य करते है। उन्हें करने दिया जाये, प्रोत्साहित करें और उनका सहयोग करें। हम स्वयं भी अपनी डिमांड सीमित रखकर, रहने के तरीकों को सरल बनाकर पर्यावरण संरक्षण व सस्टेनेबल डेवलपमेंट के लिए निम्न प्रकार से अहम रोल अदा कर सकते है। 

               1. आदिवासी अर्थात स्वदेशी लोग (indigenous People) दुनिया की सतह क्षेत्र के एक चौथाई (1/4th , 25%) हिस्से पर रहते है परन्तु वे दुनिया की 80 % बची हुई जैव विविधता की रक्षा करते हैं। उनसे जीवन को कैसे सादा रखा जाये यह सीखा जा सकता है। अपनी आवश्यकताओं को नियंत्रित करके वस्तुओं व सेवाओं के सीमित उपयोग/उपभोग से ऊर्जा की आवश्यकता को परोक्ष रूप से कम कर कोयले एवं पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स की खपत को कम करने में सहयोग कर सकते है।

                2. जरूरत से ज्यादा मैटेरियल लगने वाले समस्त डिजाइन बड़ी मात्रा में अधिक सामग्री के स्तेमाल का कारण बनते है। इसी प्रकार मशीनों व असेटस् के रखरखाव में इनएफीसियेंसी भी अधिक ईधन तेल, ल्यूब आयल व अन्य मदों की बेवजह खपत का कारण होती है। अतः डिजाइन व मेन्टेनेंस से सम्बन्धित व्यक्ति उनके कार्यो को सही निष्पादित करके मदों की खपत कम करने में अहम रोल अदा कर पर्यावरण संरक्षण में विशेष सहयोग कर सकते है। 

               3. चीजों के उपयोग को रेडूस (कम), रीयूज (दुबारा उपयोग), रीसायकल (दूसरी चीज़ बनाने में उपयोग) करें।


                   4. पेपर नैपकिन्स को बनाने में बहुत अधिक संख्यां में पेड़ काटे जाते है। उनका कम से कम उपयोग करें। 

                   5.  बिजली व डीजल/पैट्रोल की खपत में मितव्यता बरते। 

                   6.  प्लास्टिक के कैरी बैग्स का कम से कम उपयोग करें। 

                   7. अधिक से अधिक अधिक संख्यां में पेड़ लगाएँ।  

                 पर्यावरण के संरक्षण के लिए वास्तव में सलाह से ज्यादा काम करें। पर्यावरण संरक्षण हेतु माँ की तरह काम करे ना कि दाई की भांति सलाह दे।

रघुवीर प्रसाद मीना 







            

विश्व पर्यावरण दिवस 2021 : GHGs - Green House Gases (ग्रिन हाउस गैसेज़) व ग्लोबल वार्मिग।

rpmwu387 dt 05.06.2021    

    GHGs - Green House Gases (ग्रिन हाउस गैसेज़) व ग्लोबल वार्मिग।

दिनॉक 21 व 22.03.2016 को इरिसेन, पुणे में Training-cum-Capacity Building for Management of Green House Gases में भाग लिया। बहुत ही महत्व का विषय है। विश्व पर्यावरण दिवस 2021 के अवसर पर सभी की जानकारी के लिए निम्न महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में पुनः अवगत करवाया जाता है -
1. वातावरण में उपस्थित ग्रिन हाउस गैसेज़ (GHGs) अर्थात् CO2, CH4, CFCs, N2O इत्यादि सूरज की किरणें जब धरती से टकराकर बापस ब्रहमॉड में जाती है तो उन्हें रोक लेती है जिसके कारण पृथ्वी के वातावरण का तापमान बढ़ता है।
2. ये गैस ज्यादा मात्रा में होंगी तो धरती से टकराने के बाद वापस जाने वाली सूर्य की ज्यादा किरणों को रोकेंगीं व वातावरण का तापमान ज्यादा बढ़ेगा। इसे ही ग्लोबल वार्मिग कहते है।
3. ग्लोबल वार्मिग के बहुत सारे दुष्परिणाम है जो कि लम्बे समयान्तराल में पृथ्वी पर जीवन को ख़तरा उत्पन्न कर सकता है।
4. कोयला व पेट्रोलियम उत्पाद, जो कि धरती के अन्दर दबे हुए है, को काम में लेने अर्थात् जलाने से इन गैसों (GHGs) की मात्रा वातावरण में बढ़ती है और वह ग्लोबल वार्मिग का कारण बन रही है। इसे माना जा सकता है कि पृथ्वी के अन्दर दबे हुए राक्षस को जगाया जा रहा है।
5. जानकर आश्चर्य होगा कि एक लीटर डीज़ल को जलाने से वज़न के हिसाब से 2.86 किलोग्राम कार्बन डाइआक्साइड (CO2) बनती है। 1 लीटर डीज़ल में 0.78 किलोग्राम कार्बन होता है। कार्बन का एक अणु आॉक्सिजन के दो अणूओं के साथ मिलकर CO2 बनाता है। कार्बन के परमाणु का एटोमिक वेट 12 होता है तथा ऑक्सिजन अणु का 32, इस प्रकार 0.78 x 44/12 = 2.86 आता है।
6. इसी प्रकार 1 मेगावॉट-ऑवर अर्थात् 1000 यूनिट बिजली को बनाने में 0.82 टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है।
7. विश्व स्तर पर United Nations Framework Convention for Climate Change (UNFCCC) संस्था इस बिषय को डील करती है।
8. पिछले दिनों 2015 में पैरिस में हुई अर्थ समिट में विभिन्न देशों ने अपने अपने INDCs ( Intended Nationally Determined Contributions) अर्थात् GHGs के स्तर को कम करने हेतु लिए जाने वाले एक्शन्स के बारे में कमिटमेंट दिया था। हमारा देश सन् 2030 तक 2005 की तुलना में इन गैसों के उत्सर्जन को 33% कम करेगा।
9. इन गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए सरकार अपने स्तर पर रिन्युएबल एनर्जी सोर्सेज अर्थात् सोलर, हाइड्रल, विंड व न्युक्लियर पॉवर प्लान्ट डवलप कर रही है। इसके साथ साथ देश का हर व्यक्ति डीज़ल/पैट्रोल व बिजली की खपत को कम करके ग्रिन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने में मदद कर सकता है।
10. हम सभी को विभिन्न रिसोर्सेज़ को बड़े सावधानी व समझदारी से उपयोग में लेना चाहिये ताकि ऊर्जा की आवश्यकता को कम रखा जा सके और ग्रिन हाउस गैसेज़ भी कम ही उत्सर्जित हो । भावी पीढ़ियों हेतु सुरक्षित पृथ्वी देने के लिए यह ज़िम्मेदारी हम सभी को निभानी ही चाहिये।

रघुवीर प्रसाद मीना



Thursday, 3 June 2021

बीज व पेड़ में जिस प्रकार का सम्बन्ध है वैसा ही सम्बन्ध हमारे कृत्यों व जीवन की परिस्थितियों में होता है। छोटे बीज से विकसित पेड़ बहुत बड़ा आकार ले सकता है, इसी प्रकार हमारे अच्छे या बुरे कर्म स्वरूप बीज विकसित होकर जीवन में तदनुसार परिस्थितियां उत्पन्न करते है।

rpmwu385 dt. 03.06.2021
बीज छोटा होता है परन्तु उससे विकसित पेड़ बहुत बड़ा हो सकता है। और बीज जिस चीज का होता है पेड़ भी उसी का होगा। कभी इमली के बीज से आम का पेड़ नहीं उग सकता है। अर्थात् जैसा बीज वैसा पेड़।

उपरोक्त से हमें यह समझना चाहिए कि हम जो भी कृत्य करते है वह कितना भी छोटा क्यों न हो, चाहे छुप कर किये गये हो परंतु उसके होने वाले परिणाम बहुत बड़े हो सकते हैं और उस कृत्य के तदनुसार ही परिस्थितियां बनती है। अतः जो लोग अच्छे कार्य करते हैं उन्हें जीवन में अच्छी परिस्थितियां मिलती है एवं जो गलत कार्य करते हैं उन्हें जीवन में खराब परिस्थितियां मिलना निश्चित है। 

प्रकृति के समय के अंतराल की तुलना में मनुष्य का जीवनकाल बहुत ही सुक्ष्म होता है। अतः हो सकता बीज बोने अर्थात् कृत्य करने से पेड़ बनने यानि परिस्थितियां बनने में एक से अधिक पीढ़ी लग जाये। परन्तु कर्मो का उनके अनुरूप फल अवश्य प्राप्त होता है। इसप्रकार जो भी व्यक्ति गलत कार्य करते है वे अदूरदर्शी होते है एवं स्यंव या भावी पीढ़ियों के नुकसान का ही बीज बोते है।

मनुष्य को उपरोक्त से सीख लेकर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गलत कार्य व दूसरों को बेवजह हानि पहुंचाने इत्यादि से बचना चाहिए।दीर्घकाल में स्वयं उसका व उसकी भावी पीढ़ियों का ही भला होगा।

सादर 
रघुवीर प्रसाद मीना 


Wednesday, 14 April 2021

भारत रत्न बाबा सहाब डाॅ भीमराव अम्बेडकर के जीवन से सीखने योग्य महत्वपूर्ण बातें ।


rpmwu384 14.04.2021

14 अप्रैल 2021 : गंंभीर विषमताओं में सफलता हासिल करने वाले, शिक्षा के महत्व का पाठ पढ़ाने वाले, भारतीय संविधान के निर्माता, अछूूतों और गरीबों के मसीहा, महिलाओं के उत्थानकर्ता, देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने वाले, भारत रत्न बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर (14 अप्रैल 1891 से 6 दिसम्बर 1956) की 130 वीं जयंती पर उनको कोटि कोटि नमन करते हुए समस्त देशवासियों को ऐसे महापुरुष के जन्मदिवस के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं। बाबासाहब का जीवनकाल तो सामान्य मनुष्य की भांति 65 वर्ष का ही था परंतु उन्होंने हमारे देश भारत के अछूतों, गरीब, कमजोर, पिछड़ों, असहाय, महििलाओं और अर्थव्यवस्था के उत्थान के लिए 65 x 100 = 6500 वर्षों में हो सकने वाले कार्यो से भी कहीं अधिक कार्य किये। शोषित वर्ग के उत्थान हेतु उनके द्वारा कियेे गये कार्यो की सराहना समस्त संसार में होती है।

भारत रत्न बाबा सहाब डाॅ भीमराव अम्बेडकर के जन्मदिवस के शुभ अवसर पर ऐसे महापुरुष के जीवन से सीखने योग्य महत्वपूर्ण बातों की समरी बनाना तो कठिन कार्य है तदापि एक प्रयास है। प्रमुख रूप से हर व्यक्ति, बाबा साहब के जीवन से निम्नलिखित प्रेरणा ले सकता है - 
1. उद्देश्य के प्रति समर्पण : जीवन में बड़ा उद्देश्य तय करें एवं विपरीत परिस्थितियों में आगे बढ़ने के लिए कठोर परिश्रम व लगन के साथ प्रमुख रूप से तय किये गए उद्देश्य पर टिके रहने की आवश्यकता है। परेशानियों के आने पर उद्देश्य से नहीं भटकना चाहिए।

2. लीडरशिप : संविधान बनाते समय यदि कन्स्टिट्यूेन्ट असेम्बली में वे लीडर का रोल नहीं लेते तो जो वे चाहते थे वह संविधान में प्रविष्ट नहीं हो पाता। अत: जब भी टीम में काम करने का मौका मिले तो अग्रणी रोल में रहने की जरूरत है।

3. स्पेशियलाईजेशन : अपने क्षेत्र में मेहनत व परिश्रम करके दक्षता हासिल करें ताकि दूसरे लोग उस क्षेत्र विशेष में आपका आदर करें।

4. निडरता : साईमन कमिशन के वक्त उनको देश द्रोही तक करार दे दिया गया व पूना पैक्ट से पूर्व जब गाँधी जी भूख हड़ताल पर थे तब लोगों ने उन्हें जान से मारने तक की धमकी दी थी। परन्तु वे कमजोर वर्ग के हित में उनकी माँगो पर अडिग रहे।

5. निस्वार्थता : पढाई के पश्चात बाबा साहब जब अमेरिका से वापस भारत लौट रहे थे तब उनको पता था कि भारत में उनके साथ कैसा व्यवहार होने वाला है, बडौदा में नौकरी करते वक्त रहने का ठिकाना तक नहीं मिल पायेगा और चपरासी भी पानी नहीं पिलायेगा। फिर भी देश व समाज सेवा के लिए वे भारत आये। सामान्य व्यक्ति भारत आने की बजाय पत्नि व बच्चों को अमेरिका ले जाता एवं आराम से इज्जत की जिंदगी जीता। परन्तु बाबा सहाब ने निस्वार्थता का परिचय दिया और उन्होंने समाज सेवा हेतु आराम को त्यागकर कठिनाई भरी राह चुनी।

6. पहचान नहीं छिपाई व अपने लोगों के साथ साथ कमजोर की वकालत : बाबा सहाब ने जीवन में कभी भी स्वयं की पहचान नहींं छिपाई, हमेशा कमजोर के जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश की। उन्होंने न केवल अछूतों बल्कि मजदूरों व महिलाओं के लिए क्रमशः निर्धारित ड्यूटी आवर्स व हिन्दू कोड बिल बनाया। पिछडो की उन्नति हेतु संविधान में आरक्षण सहित अनेक प्रावधान किये।

7. योग्यता के स्तर का काम : सामन्यतः व्यक्ति उनकी योग्यता से छोटा काम करते हैं क्योंकि वे कार्य उनको आसान लगते हैं। परन्तु सोचो यदि बाबाासाहब संविधान लिखने की वजाय उनकी जाति के लोगों की भांति सामान्य काम करने मेंं लग जाते तो क्याा होता? इस बात को ध्यान में रखते हुए पढ़े-लिखे और अनुुुभवी लोगों उनकी योग्यता व अनुभव के अनुरूप ही कार्य करने चाहिए। 

8. बदले की भावना नहीं रखी: उनको जीवन में अनेको बार जाति के आधार पर घोर अपमान सहना पड़ा परन्तु उन्होनें कभी भी ऊँची जाति के लोगो को नुकसान नहीं पहुँचाया।

9. आरक्षित वर्ग : जीवन में उत्थान हेतु आरक्षण का प्रावधान बाबासाहब की परिकल्पना से ही संभव हो पाया। अतः आरक्षित वर्ग के हर व्यक्ति की जिम्मेदारी बनती है कि वह कड़ी मेहनत के साथ सम्पूर्ण निष्ठा व लगन से कार्य करे। व्यक्ति को उसके कार्य क्षेत्र में महारत हासिल करनी चाहिए , नई नई स्किल सीखनी चाहिए। कभी भी स्वयं की कमियों व इनएफ़्फीसिएन्सी को छुपाने के लिए बाबासाहब का नाम कारपेट की भाँति उपयोग में नहीं लें। 

10. भेदभाव नहीं करें : जाति व धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करें। दूसरे व्यक्ति के बैकगॉउन्ड को समझे, व्यक्ति के मस्तिष्क का सॉफ्टवेयर उसके पालनपोषण पर निर्भर करता है।

11. विषमता के समय बाबासाहब को याद करें : जब भी ख़राब परिस्थिति हो तो बाबासाहब व उनके जीवन की कठिनाईओं और उनके संघर्ष को याद करेें, समाधान अवश्य मिल जायेगा।  

बाबासाहब का सर्वाधिक महत्वपूर्ण नारा : 
शिक्षित बने, संगठित रहे और संघर्ष करें को याद रखे व इसका जीवन में अनुसरण करें।
 
उक्त तो कुछ ही पहलू है उनके व्यक्तित्व को समराईज करना आसान नहीं है।

सादर 
रघुवीर प्रसाद मीना

Sunday, 21 March 2021

आज्ञाकारिता (Obedience) सकारात्मक व जनहितैषी होती है जबकि अंधी आज्ञाकारिता (Blind Obedience) नकारात्मक व जनविरोधी होती है। मिलग्राम प्रयोग के बारे में अवश्य जाने व उसे समझे और अंधी आज्ञाकारिता से बचे तथा आवश्यकता पड़ने पर अथॉरिटिज् के गलत आदेशों के विरूध्द जाकर भी जनहित में अपने पक्ष रखने से डरे नहीं।

      rpmwu383 dated 31.03.2021
मिलग्राम एक्सपेेरिमेंट
अकेले हिटलर ने 60 लाख यहुदियों को नहीं मारा था। यदि माने कि हिटलर के मन में विचार आया कि यहुदी खराब है और उन्हें मारना ही देश हित है तो क्या वह अकेला इतनी बड़ी संख्या में लोगों की निर्मम हत्या कर सकता था? कदापि नहीं। उसके निर्देशों की पालना करने वाले अनेकों सैन्य अधिकारी, सैनिक, गैस चैंबर बनाने वाले इंजीनियरस्, गैस खोलने वाले लोग, यहुदियों के पुरूष, स्त्री व बच्चों को पकड़कर लाने वाले अनेकों अनेक लोग हिटलर के आदेशों की अंधी आज्ञाकारिता (Blind Obedience) करते रहे और गलत कार्य संपन्न होता रहा।
 
बड़ी स्केल पर होने वाले सभी गलत कार्यों को कोई अकेला व्यक्ति कर ही नहीं सकता है। वास्तव में बड़े पैमाने पर होने वाले गलत कार्यों के निष्पादित होने में बहुत सारे लोगों की अथॉरिटी के प्रति अंधी आज्ञाकारिता आवश्यक रूप से शामिल होती है।

जैसा कि हम सभी समझते हैं कि मां बाप, शिक्षक, अपने से बड़े लोगों की बात अधिकांशतः व्यक्ति मानते ही है क्योंकि बचपन से हमारा मष्तिष्क उसी प्रकार से प्रशिक्षित किया हुआ होता है। अंधी आज्ञाकारिता के वशीभूत होकर एकलव्य ने तो तथाकथित गुरु के कहने पर अपने दायें हाथ का अंगूठा तक काट कर गुरू दक्षिणा में दान कर दिया था। 

अंधी आज्ञाकारिता व अथॉरिटी के प्रति समर्पण को समझने के लिए 1960 के दशक में स्टेनली मिलग्राम नामक मनोवैज्ञानिक ने एक सामाजिक प्रयोग किया जोकि मिलग्राम एक्सपेरिमेंट के नाम से प्रसिद्ध है। उनके इस प्रयोग में कुल 3 लोग होते हैं एक एक्सपेरिमेंट कराने वाला (अथॉरिटी), दूसरा टीचर (शिक्षक) और तीसरा स्टूडेंट (शिक्षार्थी)। एक्सपेरिमेंट में तय किया गया कि स्टूडेंट से प्रश्न पूछे जाएंगे और यदि वह गलत उत्तर देता है तो पहले गलत उत्तर पर 15 वोल्ट का शाॅक दिया जाएगा, दूसरे गलत उत्तर पर 30 वोल्ट का शाॅक दिया जाएगा, तीसरे गलत उत्तर पर 45 वोल्ट का शाॅक दिया जाएगा। इसी प्रकार से 30 गलत उत्तर देने पर शाॅक के वोल्टेज का लेवल 450 वोल्ट तक पहुंचेगा। किसी भी व्यक्ति के लिए 300 वोल्ट का शाॅक ही बहुत भारी शाॅक होता है जिस पर आदमी बुरी तरह घायल और परेशान हो जाता है और 450 वोल्ट के शॉक पर तो व्यक्ति लगभग मर ही जाता है व गिर पड़ता है। 

शाॅक देने के लिए स्टूडेंट को अलग कमरे में बंद कर दिया गया एवं इस प्रकार का सिस्टम बनाया गया कि टीचर स्टूडेंट को देख तो नहीं सकता था परन्तु उसकी आवाज़ सुन सकता था। एक्सपेरिमेंट में शाॅक देने के अरेंजमेंटस्, टीचर व एक्सपेरिमेंट करवाने वाली अथॉरिटी एक दूसरे कमरे में थे। वास्तव में तो शॉक स्टूडेंट को नहीं लगने थे परन्तु प्रत्येक वोल्ट के अनुरूप प्री रिकार्डेड आवाजो़ से टीचर को महसूस हो रहा था कि शाॅकस् के कारण स्टूडेंट बेहद परेशान व भयंकर कष्टमय हो रहा है। टीचर को इस प्रकार के अरेंजमेंटस् का पता नहीं था और वह हकीकत में सोचता था कि शाॅक वास्तविक है।

अब एक्सपेरिमेंट शुरू होता है। जैसे ही स्टूडेंट गलत उत्तर देता है वैसे ही टीचर ने 15 वोल्ट का प्रारंभिक शाॅक दिया। तत्पश्चात हर गलत उत्तर पर शाॅक की इंटेंसिटी 15-15 वोल्टस् बढ़ाई गई और 450 वोल्ट के दिल दहलाने तक के शाॅक स्टूडेंट्स को दिए गए। 300 से 450 वोल्ट के भयावह शाॅक में व्यक्ति जोर से चीखता था और धड़ाम से गिरने तक की आवाज़ आती थी। कुल 40 में से 26 टीचरस् (65%) ने स्टूडेंट्स् को 450 वोल्ट तक के शाॅक दे डाले। भयावह व दर्दनाक आवाजों से टीचर्स भी दुखी हो रहे थे, उनको पसीना आ रहा था, उनकी हार्टबीट बढ़ जाती थी, हावभाव से लग रहा था कि उन्हें बहुत ही खराब लग रहा था परंतु फिर भी वे एक्सपेरिमेंट करवाने वाले व्यक्ति की अथॉरिटी की अंधी अनुपालना कर रहे थे। 

वास्तविक जीवन में भी ऐसा ही होता है जब कोई अथॉरिटी की पोजिशन पर बैठा व्यक्ति सबोर्डिनेट पोजीशन वाले व्यक्ति से किसी कार्य के लिए कहता है तो सामान्यतः सबोर्डिनेट व्यक्ति उस कार्य को करने के लिए राजी हो जाता है जबकि वह मन में भले ही समझ रहा हो कि किया जा रहा कार्य सही नहीं है, उसे नहीं करना चाहिए इत्यादि। 

यदि लोग हिटलर को उसके गलत कार्य में अंधी आज्ञाकारिता नहीं करते तो 60 लाख यहुदियों की निर्मम हत्या नहीं होती। बड़े स्तर के हर गलत कार्यों के पीछे अंधी आज्ञाकारिता का गंभीर रोल रहता है। 

मिलग्राम एक्सपेरिमेंट से हमें समझना चाहिए कि यदि अथॉरिटी की पोजीशन के बल पर कोई व्यक्ति गलत काम करवाना चाहे तो हमें उस पर गहन विचार करना चाहिए और अपने मन मष्तिष्क की बात को सुनें तथा अथॉरिटी द्वारा गलत कार्य हेतु दिये गये आदेशों की अंधी आज्ञाकारिता नहीं करें।

सादर
रघुवीर प्रसाद मीना

Sunday, 27 September 2020

राजा राममोहन रॉय - महान समाज सुधारक

 

(rpmwu382 dt. 27.05.2020)

राजा राममोहन राय (22 मई 1772 - 27 सितंबर 1833) को भारतीय पुनर्जागरण का अग्रदूत और आधुनिक भारत का जनक कहा जाता है। इनके पिता का नाम रमाकांत तथा माता का नाम तारिणी देवी था। राजा राममोहन राय की दूर‍दर्शिता और वैचारिकता के सैकड़ों उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं।वे रू‍ढ़िवाद और कुरीतियों के विरोधी थे लेकिन संस्कार, परंपरा और राष्ट्र गौरव उनके दिल के करीब थे। वे स्वतंत्रता चाहते थे लेकिन चाहते थे कि इस देश के नागरिक उसकी कीमत पहचानें।

राजा राममोहन राय का जन्म बंगाल में 1772 में हुआ था।15 वर्ष की आयु तक उन्हें बंगालीसंस्कृतअरबी तथा फ़ारसी का ज्ञान हो गया था। किशोरावस्था में उन्होने काफी भ्रमण किया। उन्होने 1809-1814 तक ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए भी काम किया। उन्होने ब्रह्म समाज की स्थापना की तथा विदेश (इंग्लैण्ड तथा फ़्रांस) भ्रमण भी किया।

राजा राममोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी छोड़कर अपने आपको राष्ट्र सेवा में झोंक दिया। भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के अलावा वे समाज में व्याप्त कुरितियों से भी लड़ाई लड़ रहे थे। उस वक्त देश के नागरिक अंधविश्वास और कुरीतियों में जकड़े थे। राजा राममोहन राय ने उन्हें झकझोरने का काम किया। बाल-विवाह, सती प्रथा, जातिवाद, कर्मकांड, पर्दा प्रथा आदि का उन्होंने भरपूर विरोध किया। देवेंद्र नाथ टैगोर उनके सबसे प्रमुख अनुयायी थे। आधुनिक भारत के निर्माता, सबसे बड़ी सामाजिक - धार्मिक सुधार आंदोलनों के संस्थापक, ब्रह्म समाज, राजा राम मोहन राय सती प्रणाली जैसी सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अंग्रेजी, आधुनिक चिकित्सा प्रौद्योगिकी और विज्ञान के अध्ययन की वकालत की।

आज ऐसे महान समाज सेवी की पुण्यतिथि की अवसर पर अपने आप से प्रश्न करें कि समाज से अंधविश्वास व कुरतियों की समाप्ति के  लिए में स्वयं क्या कर रहा हूँ ? क्या में स्वयं तो अंधविश्वास व कुरीतियों को बढ़ावा तो नहीं दे रहा हूँ? 

हमें जय जवान जय किसान जय विज्ञान जय अनुसंधान के साथ सभी के उत्थान पर बल देना चाहिए। 


सादर 
रघुवीर प्रसाद मीना 


Tuesday, 15 September 2020

Happy Engineers' Day : 15th September


                                             
(rpmwu381 dt.15.09.2020)
विश्व में #इंजीनियरस् ने #मानव_जीवन को #सुलभ एवं #सुखद बनाने के लिए अनेकों #इंफ्रास्ट्रक्चर, विभिन्न #मशीनों, #सेटेलाईट व #आईटी का #आविष्कार किया है। अपने आसपास देखोगे तो लगेगा कि मनुष्य के काम में आनेवाली हर चीज, इंजीनियरस् की मेहनत और लगन का ही परिणाम है।

विदेशों के सफल इंजीनियरस् की भाँति भारत के इंजिनियरस् को भी #स्वयं_के_हाथ_से_काम करने में #गर्व महसूस करना चाहिए ना कि केवल साहब बनकर आदेश देने में। यदि हमारे देश के इंजिनियरस् स्वयं के हाथ से काम करने को अच्छा समझने लगेंगे तो किये जाने वाले कार्यों की #गुणवत्ता_बेहतर होगी और #देश_की_प्रगति  को #गति मिलेगी।

इसी प्रकार #आम_नागरिकों को भी चाहिए कि वे साहब कल्चर से बाहर आकर #स्वयं_के_हाथ_से_काम_करने_वाले_व्यक्तियों को #ज्यादा_इज्जत की नजर से देखें व उनका #सम्मान करें।

रघुवीर प्रसाद मीना

Tuesday, 11 August 2020

The Indian Removal Act 1830 : Sufferings of Red Indians in America.



rpmwu380 dt. 11.08.2020

अमेरिका में इंडिजिनस लोगों के साथ भयंकर अत्याचार हुआ। भली-भांति एवं अच्छी तरह से सेटल्ड 5 आदिवासी समुदायों को मिसिसिपी नदी के पश्चिम में जबरदस्ती डंडे व बंदूक की नोक पर डिस्प्लेस कर दिया गया। ऐसी परिस्थितियों में आदिवासियों को बहुत अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ा, ठंड व बीमारी की वजह से बहुत सारे आदिवासी मारे गए थे। उनके संसाधनों को लूटा और उन्हें ऐसी जगह जाने को मजबूर कर दिया जहां पर संसाधन नहीं थे अथवा रहने में भयंकर परेशानी थी। एक कानून बनाकर इस प्रकार का अत्याचार करना घोर निंदनीय है।

इस वीडियो लिंक को अवश्य देखें और समझे कि किस प्रकार से इंडियन कहे जाने वाले अमेरिकी आदिवासियों के साथ बाहर से आने वाले लोगों ने कितना अत्याचार किया।

हमारे देश में भी यदि देखा जाए तो पंजाब, हरियाणा व उत्तर प्रदेश में जहां सबसे उपजाऊ भूमि है वहां पर आदिवासियों की संख्या लगभग नगण्य होना यह सिद्ध करता है कि उपजाऊ भूमि से आदिवासियों को जंगलों की ओर धकेला गया।

आवश्यकता है कि हम भूतकाल से सबक लें कि ऐसा अत्याचार आखिर क्यों हो पाया? उसका एक कारण यह रहा होगा कि इंडिजिनस लोग जहां भी रहते थे वे बाहर से आने वाले लोगों की तुलना में कम चालाक थे व तकनीकी में पीछे थे।  ऐसा आखिर क्यों हुआ? इस विषय में अपने विचार अवश्य व्यक्त करें?

सादर
Raghuveer Prasad Meena