Saturday, 11 April 2026

11 अप्रेल : महात्मा ज्योतिराव फुले की जन्म जयंती के अवसर पर उन्हें शत-शत नमन।


rpmwu332 Dt. 11.04.2020
ज्योतिराव गोविंदराव फुले (जन्म - 11 अप्रैल 1827 , मृत्यु - 28 नवम्बर 1890) एक भारतीय समाजसुधारक, समाज प्रबोधक, विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक तथा क्रान्तिकारी कार्यकर्ता थे। इन्हें 'महात्मा फुले' एवं 'जोतिबा फुले' के नाम से जाना जाता है। महात्मा फुले जाति से माली थे । सितम्बर 1873 में इन्होने महाराष्ट्र में सत्य शोधक समाज नामक संस्था का गठन किया। महिलाओं व दलितों के उत्थान के लिए इन्होंने अनेक अभूतपूर्व कार्य किए। समाज के सभी वर्गो को शिक्षा प्रदान करने के ये प्रबल समथर्क थे। वे भारतीय समाज में प्रचलित जाति पर आधारित विभाजन और भेदभाव के विरुद्ध थे।
महात्मा जोतिराव गोविंदराव फुले
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जन्म11 अप्रैल 1827
खानवाडी, पुणे, ब्रिटिश भारत (अब महाराष्ट्र में)
मृत्यु28 नवम्बर 1890 (उम्र 63)
पुणे, ब्रिटिश भारत
अन्य नाममहात्मा फुले/जोतिबा फुले/ जोतिराव फुले
धार्मिक मान्यतासत्य शोधक समाज
जीवनसाथीसावित्रीबाई फुले
हमारे देश में 19 वीं सदी में स्त्रीयों को शिक्षा नहीं दी जाती थी। वे हर प्रकार के अधिकार से वंचित रहती थी। स्त्रियों की तत्कालीन दयनीय स्थिति से महात्मा फुले जी बहुत व्याकुल और दुखी होते थे। इसलिए उन्होंने दृढ़ निश्चय किया कि वे समाज में क्रांतिकारी बदल लाकर ही रहेंगे। उन्होंने अपनी धर्मपत्नी सावित्रीबाई फुले जी को स्वयं शिक्षा प्रदान की। सावित्रीबाई फुले जी भारत की प्रथम महिला अध्यापिका थी। महात्मा फुले स्त्री पुरूष भेदभाव को समाप्त करना चाहते थे। उनका मूल उद्देश्य स्त्रीयों को शिक्षा का अधिकार प्रदान कराना, बाल विवाह का विरोध, विधवा विवाह का समर्थन व विधवाओं के मुड़न का विरोध करना रहा है। महात्मा फुले समाज की कुप्रथा, अंधश्रद्धा के जाल से समाज को मुक्त करना चाहते थे। अपना सम्पूर्ण जीवन उन्होंने स्त्रीयों को शिक्षा प्रदान कराने में, स्त्रीयों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने में व्यतीत किया।  उन्होंने कन्याओं के लिए भारत देश की पहिली पाठशाला पुणे में बनाई।  

आधुनिक भारत में शूद्रों-अतिशूद्रों, महिलाओं और किसानों के मुक्ति-संघर्ष के पहले नायक जोतीराव को बाबासाहब डाॅ भीमराव अम्बेडकर ने गौतम बुद्ध और कबीर के साथ अपना तीसरा गुरु माना है। 

19 वीं सदी में जातिप्रथा के विरुद्ध, महिलाओं को अधिकार दिलाने के लिए तथा किसानों को अंधविश्वास से मुक्ति दिलाने हेतु जिस महापुरुष महात्मा ज्योतिराव फुले ने समाज सेवा की मिसाल कायम की उनके द्वारा समाज को दिखाई गई दिशा में अभी भी कार्य करना शेष है। आओ हम उनकी जन्म जयंती पर अपने आप से वायदा करें कि उनके सपने को साकार करने हेतु सम्पूर्ण लगन, उत्साह व मेहनत से काम करें। भारत एक खोज के इस अंश को अवश्य देखें। 

https://youtu.be/TPiab336g4w

रघुवीर प्रसाद मीना 

Sunday, 14 April 2024

14 अप्रैल 2026 : भारतरत्न बाबा साहब डाॅ भीमाराम अम्बेडकर की जन्म जयंती।

  rpmwu469 Dt.14.04.2026

14 अप्रैल 2026: गंंभीर विषमताओं में उत्कृष्ट सफलताएं हासिल करने वाले, स्वयंसिद्ध कर दूसरों को शिक्षा के महत्व का पाठ पढ़ाने वाले, भारतीय संविधान के निर्माता, अछूूतों और गरीबों के मसीहा, महिलाओं के उत्थानकर्ता, देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने वाले, भारत रत्न बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर (14 अप्रैल 1891 से 6 दिसम्बर 1956) की 136वीं जयंती पर उनको कोटि कोटि नमन करते हुए समस्त देशवासियों को ऐसे महापुरुष के जन्मदिवस के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं। बाबासाहब का जीवनकाल तो सामान्य मनुष्य की भांति 65 वर्ष का ही था परंतु उन्होंने हमारे देश भारत के अछूतों, गरीब, कमजोर, पिछड़ों, असहाय, महिलाओं और अर्थव्यवस्था के उत्थान के लिए 65 x 100 = 6500 वर्षों में हो सकने वाले कार्यो से भी कहीं अधिक कार्य किये। शोषित वर्ग के उत्थान हेतु उनके द्वारा कियेे गये कार्यो की सराहना समस्त संसार में होती है। जब देश आजाद हो रहा था, जब संविधान बनाया जा रहा था और उसके पश्चात आजतक भी बाबासाहब डाॅ भीमराव अम्बेडकर के समान जाति/समुदाय के आधार पर होने वाले भेदभाव को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करने वाला, पढ़ालिखा व स्पष्ट सोच का धनी कोई भी व्यक्ति नजर नहीं आता है। उन्होंने देश के महत्वपूर्ण मसलों पर अधिकांश राय लिखित में पेश की। पाकिस्तान, कश्मीर व हिन्दू धर्म की कुरूतियों पर भी स्पष्ट राय दी। Ministry of External Affairs (विदेश मंत्रालय has written on its web page about Dr. BR Ambedkar "Who Tried to turn the wheel of Law towards social justice for all ऐसा व्यक्तित्व जिन्होंने कानून के पहिये को सभी के लिए न्याय की ओर घुमाया".

जो लोग कम पढ़े लिखे है या जिनकी समझदारी में कमी है, वे समझते है कि बाबासाहब ने दलितों के लिए ही खासतौर पर काम किया जबकि वास्तविकता यह है कि उन्होंने देश के हर नागरिक के उत्थान व कल्याण के लिए जबरदस्त उदाहरणीय काम किये थे। वैसे तो व्यक्ति की सोच (सोफ्टवेयर) उसके परवरिश (nurturing) के आधार पर बनती है परन्तु बड़े होने पर हमें तार्किक सोचने की जरूरत है और जो सही है उसकी बात करें व उसी को आगे बढ़ाया जाए। सही सोच के साथ विचार करें तो पता लगेगा कि बाबासाहब ने वास्तव में देश के हर क्षेत्र में नागरिकों के कल्याण हेतु जबरदस्त काम किया। उदाहरणार्थ - 

भारत रत्न बाबा सहाब डाॅ भीमराव अम्बेडकर के जन्मदिवस के शुभ अवसर पर ऐसे महापुरुष के जीवन से सीखने योग्य महत्वपूर्ण बातों की समरी बनाना तो कठिन कार्य है तदापि एक प्रयास है। प्रमुख रूप से हर व्यक्ति, बाबा साहब के जीवनशैली व महान कार्यो से निम्नलिखित महत्वपूर्ण गुण सीख सकता है और उन्हें देशहित व जनहित हेतु विकसित करने की आवश्यकता है  -

1.समाज हित की सोच रखें और गलत का विरोध करें : बाबासाहब डॉ भीमराव अम्बेडकर, गौतम बुद्ध, संत कबीर, महात्मा ज्योतिबा फुले, रामास्वामी पेरियार जैसे महान दार्शनिकों ने समाज के कमजोर, गरीब, कम शिक्षित , सामाजिक तौर पर उपेक्षित वर्गों की परेशानियों को समझा, उनके कल्याण की भावना रखी और किये जा रहे अत्याचार  विरुद्ध आवाज़ बुलंद की। हम यदि बाबासाहब के प्रति अपनी निष्ठा रखते है तो हमें समाज के कमजोर वर्ग के हित की सोच रखनी होगी और गलत को गलत कहने का साहस रखना होगा एवं गलत का विरोध करना होगा। 

2. शिक्षा से योग्यता अर्जित करें और योग्यता को इम्प्लिमेंट करें: बाबासाहब ने शिक्षा को सर्वोपरि माना। अपने सुप्रसिद्ध नारे "शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो" में उन्होंने शिक्षा को प्रथम स्थान दिया। यह भी कहा कि शिक्षा शेरनी के दुध के समान है, जिसे पीकर व्यक्ति उसके अधिकारों के लिए धाड़ता है। शिक्षा से व्यक्ति सम्मान पाता है व उन्नति के पथ पर आगे बढ़ सकता है। स्वयं शिक्षा ग्रहण करें व दूसरों को शिक्षा ग्रहण करने में मदद करें। शिक्षा की सुविधाओं को महत्व देवे। ऐसी संस्थाओं से जुड़े जो गरीब व कमजोर छात्रों को शिक्षा ग्रहण करने में मदद करते है। The real aim of education is action not the knowledge. अर्जित योग्यता को इम्प्लिमेंट करें। 

3. समाधान : विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति समर्पण से बहुत आगे बढ़ सकता है। परेशानियों के स्थान पर समाधानों पर ध्यान दे। ऊंगलियों के बीच में होकर समाधान ढूंढे ना कि परेशानी। 

4. उद्देश्य के प्रति समर्पण : जीवन में बड़ा उद्देश्य तय करें एवं विपरीत परिस्थितियों में आगे बढ़ने के लिए कठोर परिश्रम व लगन के साथ प्रमुख रूप से तय किये गए उद्देश्य पर टिके रहने की आवश्यकता है। परेशानियों के आने पर उद्देश्य से नहीं भटकना चाहिए।

5. निस्वार्थता : पढाई के पश्चात बाबा साहब जब अमेरिका से वापस भारत लौट रहे थे तब उनको पता था कि भारत में उनके साथ कैसा व्यवहार होने वाला है, बडौदा में नौकरी करते वक्त रहने का ठिकाना तक नहीं मिल पायेगा और चपरासी भी पानी नहीं पिलायेगा। फिर भी देश व समाज सेवा के लिए वे भारत आये। सामान्य व्यक्ति भारत आने की बजाय पत्नि व बच्चों को अमेरिका ले जाता एवं आराम से इज्जत की जिंदगी जीता। परन्तु बाबा सहाब ने निस्वार्थता का परिचय दिया और उन्होंने समाज सेवा हेतु आराम को त्यागकर कठिनाई भरी राह चुनी। जनहित को स्वयं हित से ऊपर समझे। देश की उन्नति में बाधक कुप्रथाओं व रीति रिवाजों को सही करने लिये हिन्दू कोड बिल के प्रकरण पर उन्होंने केन्द्र सरकार के मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। 
 
6. निडरता : साईमन कमिशन के वक्त उनको देश द्रोही तक करार दे दिया गया व पूना पैक्ट से पूर्व जब गाँधी जी भूख हड़ताल पर थे तब लोगों ने उन्हें जान से मारने तक की धमकी दी थी। परन्तु वे कमजोर वर्ग के हित में उनकी माँगो पर अडिग रहे। अपने विचारों को प्रकट करने में डरे नहीं।

7. लीडरशिप : संविधान बनाते समय यदि कन्स्टिट्यूेन्ट असेम्बली में वे लीडर का रोल नहीं लेते तो जो वे चाहते थे वह संविधान में प्रविष्ट नहीं हो पाता। अत: जब भी टीम में काम करने का मौका मिले तो अग्रणी रोल में रहने की जरूरत है। कश्मीर के मुद्दे पर उनकी राय स्पष्ट थी कि कश्मीर को विशेष राज्य का स्टेटस नहीं दिया जाये। 

8. स्पेशियलाईजेशन : अपने क्षेत्र में मेहनत व परिश्रम करके दक्षता हासिल करें ताकि दूसरे लोग उस क्षेत्र विशेष में आपका आदर करें।

9. पहचान नहीं छिपाई व अपने लोगों के साथ साथ कमजोर की वकालत : बाबा सहाब ने जीवन में कभी भी स्वयं की पहचान नहींं छिपाई, हमेशा कमजोर के जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश की। उन्होंने न केवल अछूतों बल्कि मजदूरों व महिलाओं के लिए क्रमशः निर्धारित ड्यूटी आवर्स व हिन्दू कोड बिल बनाया। पिछडो की उन्नति हेतु संविधान में आरक्षण सहित अनेक प्रावधान किये।

10. योग्यता के स्तर का काम : सामन्यतः व्यक्ति उनकी योग्यता से छोटा काम करते हैं क्योंकि वे कार्य उनको आसान लगते हैं। परन्तु सोचो यदि बाबाासाहब संविधान लिखने की वजाय उनकी जाति के लोगों की भांति सामान्य काम करने मेंं लग जाते तो क्याा होता? इस बात को ध्यान में रखते हुए पढ़े-लिखे और अनुुुभवी लोगों उनकी योग्यता व अनुभव के अनुरूप ही कार्य करने चाहिए। 

11. बदले की भावना नहीं रखी: उनको जीवन में अनेको बार जाति के आधार पर घोर अपमान सहना पड़ा परन्तु उन्होनें कभी भी ऊँची जाति के लोगो को नुकसान नहीं पहुँचाया। धर्म परिवर्तन के समय भी देशहित का ध्यान रखा व  बदले की भावना नहीं रखी। यदि बौद्ध के अलावा किसी और धर्म को ग्रहण करते तो देश की राजनीति ही अलग हो जाती। 

12. आरक्षित वर्ग : आरक्षण देश के नागरिकों के समग्र विकास (inclusive growth) का एक महत्वपूर्ण टूल है। यदि आरक्षण नहीं होता तो देश को बहुत अधिक नुकसान होता। आरक्षण नहीं होने से देश में 3 स्थिति हो सकती थी। प्रथम दलितों, आदिवासियों व पिछड़े वर्गों का अलग देश बन जाता, द्वितीय अलग देश नहीं बन पाता तो देश में अत्याचारों के विरूद्ध दलित, आदिवासी व पिछड़ो के अधिकारियों के लिए गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनी रहती अथवा तृतीय यदि कुछ भी नहीं हो पाता तो एक बहुत बड़ी जनसंख्या उनकी क्षमता का सदुपयोग नहीं कर पाती। 

आरक्षित वर्ग के लोगों के जीवन का उत्थान हेतु आरक्षण का प्रावधान बाबासाहब की परिकल्पना से ही संभव हो पाया। अतः आरक्षित वर्ग के हर व्यक्ति की जिम्मेदारी बनती है कि वह कड़ी मेहनत के साथ सम्पूर्ण निष्ठा व लगन से कार्य करे। व्यक्ति को उसके कार्य क्षेत्र में महारत हासिल करनी चाहिए , नई नई स्किल सीखनी चाहिए। कभी भी स्वयं की कमियों व इनएफ़्फीसिएन्सी को छुपाने के लिए बाबासाहब का नाम कारपेट की भाँति उपयोग में नहीं लें। 

13. भेदभाव नहीं करें : जाति व धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करें। दूसरे व्यक्ति के बैकगॉउन्ड को समझे, व्यक्ति के मस्तिष्क का सॉफ्टवेयर उसके पालनपोषण पर निर्भर करता है।

14. बाबासाहब का सर्वाधिक महत्वपूर्ण नारा : शिक्षित बने, संगठित रहे और संघर्ष करें को याद रखे व इसका जीवन में अनुसरण करें।

15. माँ जैसा रोल : जनहित के प्रमुख उद्देश्यों के लिए दाई की बजाय माँ की भांति काम करें।

16. दूसरों को गलत करने से रोके : अस्पृश्यता को समाप्त करवा कर उन्होंने दूसरों को और अधिक पाप करने से रोका। यदि कोई गलत या अत्याचार कर रहा है तो उसे गलत करने से रोकना चाहिए। 

17. विषमता के समय बाबासाहब को याद करें : जब भी ख़राब परिस्थिति हो तो बाबासाहब व उनके जीवन की कठिनाईओं और उनके संघर्ष को याद करेें, समाधान अवश्य मिल जायेगा।  Whenever you are in doubt about bad or good things, remember the face of the Babasahab, it will clear the clouds of the doubts.

ये तो कुछ ही पहलू है उनके व्यक्तित्व को समराईज करना आसान नहीं है। जरुरत है कि बाबासाहब के महान व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर हम सभी अपने अपने कार्य को सही तरीक़े से पूर्ण क्षमता व एफिसिन्सी के साथ निष्पादित करें। साथ में दूसरों की आवश्यकताओं का भी ध्यान रखें और यथासंभव सभी देशवासियों को प्रसन्न रखने का प्रयत्न करें। इतिहास की ज्यादा खोजबीन करने की बजाय वर्तमान व भविष्य पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। बाबासाहब के द्वारा लिखे गए दस्तावेजों व किताबों को पढ़े और उनसे प्रेरणा ले। Cultivation of mind should be the ultimate aim of human existence. Small minds discuss people, medium minds talk of events and great minds ponder over ideas. Implementation of the provisions of the constitution is extremely important for the welfare of the citizens, we all must individually and collectively strive for the same.

जय भीम जय हिंद 
रघुवीर प्रसाद मीना

Monday, 22 January 2024

श्रीराम भगवान से प्रेरणाएं एवं सीखें

rpmwu468 dt. 22.01.2024
आज दिनांक 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में श्रीराम भगवान के भव्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम संपन्न होने जा रहा है और देश के नागरिकों में बहुत ही उल्लास और जोश है। आशा करनी चाहिए कि वर्तमान व भावी पीढ़ियां श्रीराम भगवान की जीवन-पद्धति को थोड़ा-बहुत अपनाकर सामाजिक सौहार्द व देश के विकास में बेहतर जिम्मेदारी निभायेंगी। 

श्रीराम भगवान की जीवन लीला के बारे में रामायण जी, रामलीला, धारावाहिकों, फिल्मों, बुजूर्गो के सानिध्य व अन्य ग्रथों और दस्तावेजों से थोड़ी बहुत जानकारी तो लगभग सभी को है। उनके जीवन से ली जाने वाली प्रेरणाएं व सीखें को लिख पाना तो सम्भव नहीं है। फिर भी मोटे तौर पर हर व्यक्ति निम्नलिखित प्रेरणाएं व सीखें ग्रहण करके सामाजिक व्यवस्था को बेहतर बनाने व देश की उन्नति में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है -
1. अपने चरित्र में मानवीयता के उच्च आदर्श व सिद्धांत विकसित करें।
2. संबंधों को निभाने के लिए त्याग करने की भावना हो। आराम व स्वार्थ से ऊपर उठे। माँ बाप के आदेशों व भावनाओं और भाइयों के प्रति समर्पित रहे। दूसरों द्वारा हमारे लिए किये गये कार्यों हेतु हमेशा कृतज्ञ रहे।
3. अच्छों को संरक्षण दे तथा दुष्टों के विनाश की कार्यवाही को जनकल्याण ही समझे।
4. अपने से धन, बल, बुद्धिमता व सामाजिक व्यवस्था में कमजोर व्यक्तियों के साथ सहजता व आदर से वार्ता करे। किसी का भी सामाजिक तौर पर तिरस्कार नहीं करें। सभी को सम्मान दे। छुआछूत नहीं करें। हंसते-मुस्कुराते मानवीयता से मिले।
5. दूसरों की बातों को ध्यान और धीरज से सुनें। उनमें विश्वास कायम करे। दूसरों के विचारों और भावनाओं के प्रति सच्ची सहानुभूति रखें। दूसरे की दृष्टि से घटनाओं या वस्तुओं को देखने का प्रयास करें। अपनी त्रुटि को शीघ्र स्वीकार करें।

यदि हम भगवान श्रीराम को आदर्श मानकर जीवन जिये तो सामाजिक  व्यवस्था को अच्छी बनाने में सकारात्मक भूमिका निभा सकते है।
सादर 
रघुवीर प्रसाद मीना

Wednesday, 3 January 2024

महान समाजसेविका माता सावित्रीबाई फुले

rpmwu468 dt. 03.01.2024
(03.01.1831 - 10.03.1897)

महिलाओं के लिए शिक्षा प्रारम्भ करवाने वाली सावित्रीबाई का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ था। मात्र 10 वर्ष की आयु में इनका विवाह ज्योतिराव फुले से हुआ था। 5 सितंबर 1848 में पुणे में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं के साथ उन्होंने महिलाओं के लिए एक विद्यालय की स्थापना की। 

जब माता सावित्रीबाई महिलाओं की शिक्षा के लिए आगे आई तब समाज में महिलाओं को पढ़ाया नहीं जाता था। उनके अग्रणी रोल के कारण उनका बहुत विरोध हुआ, लोगों ने अपमान किया परन्तु उन्होंने बहादुरी और जज्बा दिखाया। वे महिला शिक्षा की प्रेरणा स्त्रोत है। उन्हें शत-शत नमन। 

सादर 

रघुवीर प्रसाद मीना 


जयपाल सिंह मुण्डा को जाने व याद करें और प्रेरणा ले।

rpmwu467/03.01.2024
जयपाल सिंह मुंडा 
(3 जनवरी 1903 – 20 मार्च 1970) 

जयपाल सिंह मुंडा देश के आदिवासियों और झारखंड में हुए विभिन्न आदिवासी आंदोलनों के एक सर्वोच्च नेता थे।  जयपाल सिंह मुंडा पढ़ने में बहुत इंटेलिजेंट थे, वे भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने वाले प्रथम आदिवासी थे। 1928 में हॉकी के विश्व कप जिसमें भारत विजेता हुआ, उस टीम के कप्तान थे। 

वे एक जाने माने राजनीतिज्ञ, पत्रकार, लेखक, संपादक, शिक्षाविद् और 1925 में ‘ऑक्सफोर्ड ब्लू’ का खिताब पाने वाले हॉकी के एकमात्र अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी थे। 

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जयपाल सिंह मुंडा कंस्टीट्यूएंट असेंबली के सदस्य थे, जिन्होंने ने संविधान के निर्माण के समय आदिवासियों के हित के संबंध में जरूरी पक्ष रखें और आदिवासियों को संविधान में जो अधिकार मिले हुए है उसमें जयपाल सिंह मुंडा का बेहद बड़ा व जोरदार योगदान रहा है। 

उनके जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद हर क्षेत्र यथा पढ़ाई, खेल व राजनीति में अच्छा प्रदर्शन किया जा सकता है। अपने लोगों के हित की बातों को बहादुरी व समझदारी से कहा जा सकता है और उन्हें लाभान्वित किया जा सकता है। 

भारत देश में आज तक किसी भी आदिवासी शख्सियत को भारतरत्न से नवाजा नहीं गया है। हमें मांग करनी चाहिए कि आदिवासियों को हक दिलाने वाले महान राजनीतिज्ञ श्री जयपाल सिंह मुण्डा जी को भारतरत्न से पुरस्कृत किया जाये। 

जोहार
रघुवीर प्रसाद मीना 

Friday, 21 July 2023

मकान मालिक को किरायेदार बनाकर बाहर कर दिया..... और कर रहे है.....


rpmwu466 Dt. 21.07.2023
सम्पूर्ण संसार में आदिवासियों की जनसंख्या 48 करोड़ (6.2%) के लगभग है और 2011 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 10.42 करोड़ (8.62%) तथा राजस्थान में 92.38 लाख (13.48%) थी। हमारे देश में कुल 705 जनजातीय समूह है जिनकी विभिन्न राज्यों में शून्य से लेकर 95% तक आबादी है।

आदिवासी यानि मूल निवास (Indigenous Peoples) जो किसी भूभाग पर बहुत पहले से ही रह रहे है। दूसरे लोग बाद में बाहर से आए। बाहर से आने वालों ने उनकी एकता, टेक्नोलॉजी व धोखाधड़ी के माध्यम से संसार में हर जगह जो स्थानीय आदिवासी थे उनके साथ बहुत क्रुर व बुरा व्यवहार किया। उनकी धन दौलत, जमीनें, खेती के संसाधन, खदान इत्यादि को लूट लिया और उन पर गंभीर अत्याचार किये और अत्याचार अभी भी जारी है। यही कारण है कि संसार में 6.2% आदिवासी कुल गरीब जनसंख्या का 19% है। इसी प्रकार कुपोषण के कारण आदिवासियों की लाईफ एक्पेंटेंसी अन्य नागरिकों की तुलना में 20 वर्ष कम है। आदिवासियों की स्थिति को प्रदर्शित करने के लिए निम्न संकलन का समय निकाल कर अवलोकन करें और देखें कि देश में आदिवासियों की कितनी दयनीय स्थिति है। 
हाल ही में मध्यप्रदेश में एक घटना हुई जिसमें एक आदिवासी पर पेशाब किया गया। मणिपुर की घटना के वीडियोज् ह्रदय विदारक है। ऐसा आखिर क्यों हो रहा है? और इसे रोकने में ऐसे तो देश के सभी नागरिकों की जिम्मेदारी है परंतु जो नागरिक आदिवासी समुदाय से संबंध रखते हैं उनकी जिम्मेदारी ज्यादा बनती है।

मणिपुर की घटना के संबंध में दिनांक 20 जुलाई 2023 को जवाहर सर्किल एक कैंडल मार्च का आयोजन किया गया। लगभग 100 युवाओं ने भाग लिया। आने वाले समय में हमें और जागरूक व संगठित होने की जरूरत है। देश के किसी भी कोने में यदि आदिवासियों के साथ अत्याचार हो तो हम पुरजोर तरीके से आवाज उठाएं। हमारे राजनेताओं को भी हम कहें कि उन्हें भी आदिवासियों के मुद्दों पर आवाज उठायें।

जोहार
रघुवीर प्रसाद मीना
Raghuveer Prasad Meena

Monday, 24 April 2023

जीवनशैली का आत्मावलोकन

rpmwu466 Dt 24.04.2023
मष्तिष्क को सकारात्मक विचार, अध्ययन, गतिविधियों में इनगेज रखें : यदि खेत में वांछित बीज नहीं डाले जाएं तो कुदरत उसे घास-फूस व खरपतवार से भर देती है। ठीक इसी प्रकार दिमाग को यदि सकारात्मक चीजों में इनगेज नहीं करेंगे तो नकारात्मक विचार वहां उनकी जगह बना लेंगे।

2. सही सगंत महत्वपूर्ण है : जिसके पास जो होता है वह वही सांझा करता है। सुखी सुख बांटता है। दुःखी दुःख बांटता है। ज्ञानी ज्ञान बांटता है। भ्रमित भ्रम बांटता है। भयभीत भय बांटता है। अंधविश्वास में डूबा व्यक्ति अंधविश्वास बढ़ाता है। 

3. जो मिले उसे पचाना सीखो : क्योंकि भोजन न पचने पर, रोग बढ़ते है। पैसा न पचने पर, दिखावा बढ़ता है। बात न पचने पर, चुगली बढ़ती है। प्रशंसा न पचने पर, अंहकार बढ़ता है। निंदा न पचने पर, दुश्मनी बढ़ती है। राज़ न पचने पर, खतरा बढ़ता है।दुःख न पचने पर, निराशा बढ़ती है। सुख न पचने पर, पाप बढ़ता है।

समय समय पर स्वयं की जीवन शैली के सम्बन्ध में आत्मावलोकन कर सुधारात्मक कार्यवाही करते रहना चाहिए।

सादर 
रघुवीर प्रसाद मीना 

Friday, 14 April 2023

14 अप्रैल 2023 : भारतरत्न बाबासाहब डॉ भीमराव अम्बेडकर की जन्म जयंती।

  rpmwu465 Dt.14.04.2023

14 अप्रैल 2023: गंंभीर विषमताओं में सफलता हासिल करने वाले, शिक्षा के महत्व का पाठ पढ़ाने वाले, भारतीय संविधान के निर्माता, अछूूतों और गरीबों के मसीहा, महिलाओं के उत्थानकर्ता, देश की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने वाले, भारत रत्न बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर (14 अप्रैल 1891 से 6 दिसम्बर 1956) की 132 वीं जयंती पर उनको कोटि कोटि नमन करते हुए समस्त देशवासियों को ऐसे महापुरुष के जन्मदिवस के अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएं। बाबासाहब का जीवनकाल तो सामान्य मनुष्य की भांति 65 वर्ष का ही था परंतु उन्होंने हमारे देश भारत के अछूतों, गरीब, कमजोर, पिछड़ों, असहाय, महिलाओं और अर्थव्यवस्था के उत्थान के लिए 65 x 100 = 6500 वर्षों में हो सकने वाले कार्यो से भी कहीं अधिक कार्य किये। शोषित वर्ग के उत्थान हेतु उनके द्वारा कियेे गये कार्यो की सराहना समस्त संसार में होती है। जब देश आजाद हो रहा था, जब संविधान बनाया जा रहा था और उसके पश्चात आजतक भी बाबासाहब डाॅ भीमराव अम्बेडकर के समान जाति/समुदाय के आधार पर होने वाले भेदभाव को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करने वाला, पढ़ालिखा व स्पष्ट सोच का धनी कोई भी व्यक्ति नजर नहीं आता है। उन्होंने देश के महत्वपूर्ण मसलों पर अधिकांश राय लिखित में पेश की। पाकिस्तान, कश्मीर व हिन्दू धर्म की कुरूतियों पर स्पष्ट राय दी। Ministry of External Affairs has written on its web page about Dr. BR Ambedkar "Who Tried to turn the wheel of Law towards social justice for all".

जो लोग कम पढ़े लिखे है या जिनकी समझदारी में कमी है, वे समझते है कि बाबासाहब ने दलितों के लिए ही खासतौर पर काम किया जबकि वास्तविकता यह है कि उन्होंने देश के हर नागरिक के उत्थान व कल्याण के लिए जबरदस्त उदाहरणीय काम किया था। वैसे तो व्यक्ति की सोच (सोफ्टवेयर) उसके परवरिश (nurture) के आधार पर बनती है परन्तु बड़े होने पर हमें तार्किक सोचने की जरूरत है और जो सही है उसकी बात करें व उसी को आगे बढ़ाया जाए। सही सोच के साथ विचार करें तो पता लगेगा कि बाबासाहब ने वास्तव में देश के हर क्षेत्र में नागरिकों के कल्याण हेतु जबरदस्त काम किया। उदाहरणार्थ - 

भारत रत्न बाबा सहाब डाॅ भीमराव अम्बेडकर के जन्मदिवस के शुभ अवसर पर ऐसे महापुरुष के जीवन से सीखने योग्य महत्वपूर्ण बातों की समरी बनाना तो कठिन कार्य है तदापि एक प्रयास है। प्रमुख रूप से हर व्यक्ति, बाबा साहब के जीवनशैली व महान कार्यो से निम्नलिखित महत्वपूर्ण गुण सीख सकता है और उन्हें देशहित व जनहित हेतु विकसित करने की आवश्यकता है  -

1 शिक्षा : से व्यक्ति बहुत सम्मान पा सकता है व आगे बढ़ सकता है। स्वयं शिक्षा ग्रहण करें व दूसरों को शिक्षा ग्रहण करने में मदद करें। शिक्षा की सुविधाओं को महत्व देवे। ऐसी संस्थाओं से जुड़े जो गरीब व कमजोर छात्रों को शिक्षा ग्रहण करने में मदद करते है। 

2. समाधान : विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति समर्पण से बहुत आगे बढ़ सकता है। परेशानियों के स्थान पर समाधानों पर ध्यान दे। ऊंगलियों के बीच में होकर समाधान ढूंढे ना कि परेशानी। 

3. उद्देश्य के प्रति समर्पण : जीवन में बड़ा उद्देश्य तय करें एवं विपरीत परिस्थितियों में आगे बढ़ने के लिए कठोर परिश्रम व लगन के साथ प्रमुख रूप से तय किये गए उद्देश्य पर टिके रहने की आवश्यकता है। परेशानियों के आने पर उद्देश्य से नहीं भटकना चाहिए।

4. निस्वार्थता : पढाई के पश्चात बाबा साहब जब अमेरिका से वापस भारत लौट रहे थे तब उनको पता था कि भारत में उनके साथ कैसा व्यवहार होने वाला है, बडौदा में नौकरी करते वक्त रहने का ठिकाना तक नहीं मिल पायेगा और चपरासी भी पानी नहीं पिलायेगा। फिर भी देश व समाज सेवा के लिए वे भारत आये। सामान्य व्यक्ति भारत आने की बजाय पत्नि व बच्चों को अमेरिका ले जाता एवं आराम से इज्जत की जिंदगी जीता। परन्तु बाबा सहाब ने निस्वार्थता का परिचय दिया और उन्होंने समाज सेवा हेतु आराम को त्यागकर कठिनाई भरी राह चुनी। जनहित को स्वयं हित से ऊपर समझे। देश की उन्नति में बाधक कुप्रथाओं व रीति रिवाजों को सही करने लिये हिन्दू कोड बिल के प्रकरण पर उन्होंने केन्द्र सरकार के मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। 
 
5. निडरता : साईमन कमिशन के वक्त उनको देश द्रोही तक करार दे दिया गया व पूना पैक्ट से पूर्व जब गाँधी जी भूख हड़ताल पर थे तब लोगों ने उन्हें जान से मारने तक की धमकी दी थी। परन्तु वे कमजोर वर्ग के हित में उनकी माँगो पर अडिग रहे। अपने विचारों को प्रकट करने में डरे नहीं।

6. लीडरशिप : संविधान बनाते समय यदि कन्स्टिट्यूेन्ट असेम्बली में वे लीडर का रोल नहीं लेते तो जो वे चाहते थे वह संविधान में प्रविष्ट नहीं हो पाता। अत: जब भी टीम में काम करने का मौका मिले तो अग्रणी रोल में रहने की जरूरत है। कश्मीर के मुद्दे पर उनकी राय स्पष्ट थी कि कश्मीर को विशेष राज्य का स्टेटस नहीं दिया जाये। 

7. स्पेशियलाईजेशन : अपने क्षेत्र में मेहनत व परिश्रम करके दक्षता हासिल करें ताकि दूसरे लोग उस क्षेत्र विशेष में आपका आदर करें।

8. पहचान नहीं छिपाई व अपने लोगों के साथ साथ कमजोर की वकालत : बाबा सहाब ने जीवन में कभी भी स्वयं की पहचान नहींं छिपाई, हमेशा कमजोर के जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश की। उन्होंने न केवल अछूतों बल्कि मजदूरों व महिलाओं के लिए क्रमशः निर्धारित ड्यूटी आवर्स व हिन्दू कोड बिल बनाया। पिछडो की उन्नति हेतु संविधान में आरक्षण सहित अनेक प्रावधान किये।

9. योग्यता के स्तर का काम : सामन्यतः व्यक्ति उनकी योग्यता से छोटा काम करते हैं क्योंकि वे कार्य उनको आसान लगते हैं। परन्तु सोचो यदि बाबाासाहब संविधान लिखने की वजाय उनकी जाति के लोगों की भांति सामान्य काम करने मेंं लग जाते तो क्याा होता? इस बात को ध्यान में रखते हुए पढ़े-लिखे और अनुुुभवी लोगों उनकी योग्यता व अनुभव के अनुरूप ही कार्य करने चाहिए। 

10. बदले की भावना नहीं रखी: उनको जीवन में अनेको बार जाति के आधार पर घोर अपमान सहना पड़ा परन्तु उन्होनें कभी भी ऊँची जाति के लोगो को नुकसान नहीं पहुँचाया। धर्म परिवर्तन के समय भी देशहित का ध्यान रखा व  बदले की भावना नहीं रखी। यदि बौद्ध के अलावा किसी और धर्म को ग्रहण करते तो देश की राजनीति ही अलग हो जाती। 

11. आरक्षित वर्ग : आरक्षण देश के नागरिकों के समग्र विकास (inclusive growth) का एक महत्वपूर्ण टूल है। यदि आरक्षण नहीं होता तो देश को बहुत अधिक नुकसान होता। आरक्षण नहीं होने से देश में 3 स्थिति हो सकती थी। प्रथम दलितों, आदिवासियों व पिछड़े वर्गों का अलग देश बन जाता, द्वितीय अलग देश नहीं बन पाता तो देश में अत्याचारों के विरूद्ध दलित, आदिवासी व पिछड़ो के अधिकारियों के लिए गृहयुद्ध जैसी स्थिति बनी रहती अथवा तृतीय यदि कुछ भी नहीं हो पाता तो एक बहुत बड़ी जनसंख्या उनकी क्षमता का सदुपयोग नहीं कर पाती। 

आरक्षित वर्ग के लोगों के जीवन का उत्थान हेतु आरक्षण का प्रावधान बाबासाहब की परिकल्पना से ही संभव हो पाया। अतः आरक्षित वर्ग के हर व्यक्ति की जिम्मेदारी बनती है कि वह कड़ी मेहनत के साथ सम्पूर्ण निष्ठा व लगन से कार्य करे। व्यक्ति को उसके कार्य क्षेत्र में महारत हासिल करनी चाहिए , नई नई स्किल सीखनी चाहिए। कभी भी स्वयं की कमियों व इनएफ़्फीसिएन्सी को छुपाने के लिए बाबासाहब का नाम कारपेट की भाँति उपयोग में नहीं लें। 

12. भेदभाव नहीं करें : जाति व धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करें। दूसरे व्यक्ति के बैकगॉउन्ड को समझे, व्यक्ति के मस्तिष्क का सॉफ्टवेयर उसके पालनपोषण पर निर्भर करता है।

13. विषमता के समय बाबासाहब को याद करें : जब भी ख़राब परिस्थिति हो तो बाबासाहब व उनके जीवन की कठिनाईओं और उनके संघर्ष को याद करेें, समाधान अवश्य मिल जायेगा।  

14. बाबासाहब का सर्वाधिक महत्वपूर्ण नारा : 
शिक्षित बने, संगठित रहे और संघर्ष करें को याद रखे व इसका जीवन में अनुसरण करें।

15. माँ जैसा रोल : जनहित के प्रमुख उद्देश्यों के लिए दाई की बजाय माँ की भांति काम करें।

16. दूसरों को गलत करने से रोके : अस्पृश्यता को समाप्त करवा कर उन्होंने दूसरों को और अधिक पाप करने से रोका। यदि कोई गलत या अत्याचार कर रहा है तो उसे गलत करने से रोकना चाहिए। 
 
ये तो कुछ ही पहलू है उनके व्यक्तित्व को समराईज करना आसान नहीं है। जरुरत है कि बाबासाहब के महान व्यक्तित्व को ध्यान में रखकर हम सभी अपने अपने कार्य को सही तरीक़े से पूर्ण क्षमता व एफिसिन्सी के साथ निष्पादित करें। साथ में दूसरों की आवश्यकताओं का भी ध्यान रखें और यथासंभव सभी देशवासियों को प्रसन्न रखने का प्रयत्न करें। इतिहास की ज्यादा खोजबीन करने की बजाय वर्तमान व भविष्य पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। बाबासाहब के द्वारा लिखे गए दस्तावेजों व किताबों को पढ़े और उनसे प्रेरणा ले। Cultivation of mind should be the ultimate aim of human existence. Small minds discuss people, medium minds talk of events and great minds ponder over ideas. Implementation of the provisions of the constitution is extremely important for the welfare of the citizens, we all must individually and collectively strive for the same.

जय भीम जय हिंद 
रघुवीर प्रसाद मीना

Sunday, 5 February 2023

संत शिरोमणि रविदास

rpmwu 464 Dt. 05.02.2023
संत शिरोमणि रविदास रैदास की जन्म जयंती के अवसर पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। आज के दिन डॉक्टर भीमराव अंबेडकर मेमोरियल वेलफेयर सोसायटी, झालाना द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया।

संत रैदास के जीवन से ली जाने वाली महत्वपूर्ण सीखें निम्न प्रकार है - 

1. संत रैदास जी ने 15वीं सदी में सामाज में फैली कुरीतियों को दूर करने के लिए सौम्य तरीके से दौहो व वाणी के माध्यम से विनम्रता के साथ कठोर प्रहार किया।

2. वे गम्भीर मानवतावादी थे। मध्यकालीन युग में गरीब व हताश लोगों को अपनी वाणी से प्रोत्साहित कर मार्गदर्शन दिया।

3. उन्होंने वर्णभेद, जातिभेद एवं साम्प्रदायिकता का विरोध किया।

4. उन्होंने कभी भी उनकी जाति नहीं छिपाई। कर्म ही धर्म है, यह माना।

5. मनुष्य की मनुष्यका को महत्वपूर्ण माना।

6. धार्मिक कर्मकांडों की शुचिता पर अत्यधिक बल देने वालों ने इस बल के आधार पर अस्पृश्यता को फैलाया। संत रविदास ने धार्मिक कर्मकांडों का जड़ से विरोध किया।

7. वे मूर्ति पूजा, यज्ञ, पुराण कथा आदि पर ध्यान नहीं देते थे।

8. गुरु के महत्व, सत्संग, संगत, मन की स्थिति, आडम्बरों की निरर्थकता, जीव, जगत व माया को समझाने पर विशेष बल दिया।

9. मांसाहार मदिरापान व हिंसा को सिरे से खारिज किया।

10. शील, संतोष और दया पर जोर दिया।

11. मानव मानव की समानता का अलख जगाया।

12. निराशा में डूबे व्यक्तियों को गहरा संभल प्रदान किया। जीवन जीने की कला का रास्ता प्रशस्त किया।

13. विवेक, भक्ति और समाज सुधार की त्रिवेणी प्रभाहित की।

14. 15 वीं सदी में जब लोग बहुत निराश व हताश हो चुके थे तब उन्होंने समाज के कमजोर व पिछड़े वर्गो के लोगों के कल्याण के लिए जन जागृति के लिए जबरदस्त पहल की। उनका डर समाप्त करने की कोशिश की।

15. हमें संत रविदास की बोल्डनेस से सीखना चाहिए कि व्यक्ति विनम्र भाषा में भी गलत को गलत कह सकता है और निराश व हताश लोगों के लिए रास्ता प्रशस्त कर सकता है।

सादर
Raghuveer Prasad Meena

Sunday, 4 December 2022

अच्छाई के सूचकांक में सुधार करें। Improve the index of goodness.

rpmwu 463 dt. 04.12.2023
व्यक्ति मूलतः अच्छा ही होता है। वह मदद, सहायता व सहयोग लेता है और करता भी है। निम्नलिखित के बारे में विचार करे व सोचे -
1. वे दो अवसर जब आपकी या आपके प्रियजन की किसी दूसरे व्यक्ति ने मदद की हो।
2. वे दो अवसर जब आपने किसी दूसरे व्यक्ति की सहायता की हो।

उक्त दोनों ही प्रकार के पल आपको अच्छा अहसास करवाने वाले है। इसलिए हमें चाहिए कि दूसरो की मदद व सहायता और सहयोग करके ऐसे पलों की संख्या में बढ़ोतरी करे। 

कृपया विचार करके प्रतिक्रिया दे।

सादर
रघुवीर प्रसाद मीना

आदिवासियों के कल्याण के लिए आवाज उठायें।

rpmwu 462 dt 04.12.2022

सही_बात_को_डट_कर_बोलें_जो_जहां_है_वहां_से_बोले। सही_व_हक_की_बात_को_कहने_में_संकोच_नहीं_करे।
हम_नहीं_कहेंगे_तो_दुसरा_कौन_और_क्यों_कहेगा?
बोलोगे_तो_सभी_सुनेंगे_और_समाधान_होगा।

Goodstep सभी जानते है और जो नहीं जानते है उन्हें इतिहास की किताबों, डाक्यूमेंट्री, सत्य पर आधारित फिल्मों इत्यादि से जानकारी हासिल करनी चाहिए कि समस्त संसार में आदिवासियों (Indigenious Peoples) पर कितने जुल्म और एट्रोसिटिज हुई है।

हम भारत की ही बात करे तो यह एकदम तथ्यात्मक है कि आदिवासी जो कि लम्बे अर्से से जंगल व पहाड़ो में रहते आये है, उनका उपयोग करते थे, उन पर हक मानते थे, को जंगल व पहाड़ो के अधिकारी नहीं दिये गये है जबकि देश की आजादी के समय राजा महाराजाओं को उनकी रियायतों की लम्बी चौड़ी जमीन, महल, खजाने इत्यादि दे दिये गये।

आदिवासियों को जंगल के जानवर की तरह माना जाता रहा। जब किसी जंगल या पहाड़ में खदान करनी होती थी तो वहां के आदिवासियों को जंगल के जानवरों की तरह ही खदेड़ दिया जाता था। और उनके विरोध करने पर उन्हें या तो मार दिया जाता है या जेलों में बंद कर दिया जाता है। यह ऐसे है जैसे किसी बच्चे की माँ की आँचल में बहुत अच्छा दूध है परन्तु पियेगा कोई दूसरा ही। 

माननीय राष्ट्रपति महोदय द्वारा गरीब आदिवासियों के दुखों को महसूस करके माननीय उच्चतम न्यायालय एवं सरकार से उनको राहत दिलाने के लिए दिशानिर्देश देने के लिए बहुत-बहुत साधुवाद।

आवश्यकता है कि वन अधिकार अधिनियम 2006 व नियम 2008 एवं संशोधित नियम 2012 की अनुपालना की भी समीक्षा करवाई जाये ताकि पता चल सके कि कितने आदिवासियों को अभी तक भी वनभूमि के अधिकार नहीं दिए गए है।

जितने भी खासकर आदिवासी राजनेता/अधिकारी/कर्मचारी है या जो भी राजनेता/अधिकारी/कर्मचारी आदिवासियों के कल्याण के बारे में सोचते है, उन्हें चाहिए कि वे इन दोनों मुद्दों को प्राथमिकता दे और आदिवासियों के साथ होने वाले अत्याचार व अन्याय और भेदभाव को कम करवाने में सहयोग दे एवं महत्ति भूमिका निभाये।

जोहार
Raghuveer Prasad Meena

Saturday, 3 December 2022

विचार करें कि पानी पर चलना सीखने पर कहीं बेवजह समय, ऊर्जा व संसाधन तो नष्ट नहीं कर रहे है?

rpmwu 461 dt 03.12.2022

जो काम वैकल्पिक तरीकों से आसानी से सम्भव हो सकते है उन पर बेवजह बहुत अधिक समय, ऊर्जा व संसाधन खर्च नहीं करने चाहिए।

एक बार दो व्यक्ति स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास गये और उनमें से एक ने दूसरे का परिचय करवाया कि महाराज इस महापुरुष ने 20 वर्ष की कड़ी मेहनत, लगन और तपस्या से पानी पर चलना सीख लिया है और अब यह बिना कपड़े गीले किये आसानी से नदी पार कर सकता है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने कहा यह काम तो 2 पैसे देकर नाव के माध्यम से आराम से किया जा सकता है। नदी पार करने के लिए पानी पर चलना सीखने में 20 वर्ष का लंबा समय खर्च करने की क्या आवश्यकता थी? वे दोनों व्यक्ति एकदम निरूत्तर हो गये।

हम भी जीवन में बहुत से कामों पर बेवजह असंगत (disproportionate) समय, ऊर्जा व संसाधन खर्च करते है। जो भी चीज हम कर रहे है उनके बारे में विचार करें और परखें कि कहीं हम पानी पर चलना सीखने जैसे कामों पर तो अनावश्यक समय, ऊर्जा व संसाधन खर्च तो नहीं कर रहे है।

सादर
Raghuveer Prasad Meena

Friday, 2 December 2022

सहयोग (Cooperation) करना मानवीय गुण है।

rpmwu 460 dt. 02.12.2022

आपस में सहयोग (Cooperation) करने के सकारात्मक गुण की मनुष्य को दूसरे जानवरों से भिन्न बनाने में अति महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मानव के जीवन को सहज, सुखमय व सुरक्षित बनाने के लिए जितनी भी चीजें ईजाद हुई है उनके बैकग्राउंड में दूसरों को सहयोग करने की भावना रही है।

जीवन में काम आने वाली चीजें यथा खाना, पानी की उपलब्धता, कपड़ा, मकान, जूता, रोड, पानी के जहाज, हवाईजहाज़, राॅकेट, ट्रेन, बस, कार, ट्रेक्टर, अन्य व्हीकलस् ,अस्पताल, टीका, दवाईयां, स्कूल, कॉलेज, शिक्षा, सरकारी सिस्टम, इलेक्ट्रिसिटी, सेटेलाईट, मोबाइल, लेपटॉप, कम्प्यूटर, इंटेरनेट, टीवी, बिजली से चलने वाले उपकरण, कोयला, डीजल, पैट्रोल की उपलब्धता, मशीनें, चश्मा, कैमरा, प्रिटिंग प्रेस या और जो भी आप देखे या समझे वे सभी किसी न किसी की मेहनत के नतीजे से सम्भव हो सकी है।

आसानी से समझा जा सकता है कि हर व्यक्ति व उसके प्रियजन दूसरों द्वारा ईजाद या बनाई गई चीजों से हर दिन हर समय लाभान्वित होते है। अतः हमारी प्रत्येक की भी जिम्मेदारी बनती है कि हम भी दूसरों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए #सहयोग की भावना से कुछ न कुछ काम अवश्य करें।

सादर
Raghuveer Prasad Meena

Sunday, 20 November 2022

सबोर्डिनेट कल्चर से बचे। वार्तालाप में धर्म, जाति, समुदाय, नौकरी व व्यवसाय के आधार पर व्यक्ति के लेवल का निर्धारण नहीं करे।

rpmwu 459 dt. 20.11.2022

#सबोर्डिनेट_कल्चर हमारे देश में सामान्यतः जब दो व्यक्ति मिलते है तो वे खुलकर बात करने से पहले एक दूसरे के बारे में यह जानने की कोशिश करते है कि सामने वाले का लेवल क्या है? दोनों ही स्वयं की तुलना में दूसरे के लेवल के काॅर्डिनेटस् तय करने का प्रयास करते है। उसके बाद वार्तालाप के व्यवहार में एक दूसरे को ऊंचा या समस्तर या नीचे मानकर आगे बढ़ते है। 

सदियों पुरानी मानसिक बीमारी है कि सामान्य नागरिक, व्यक्ति का लेवल धर्म, जाति व समुदाय के आधार पर निर्धारित करते है। माडर्न व पढ़े-लिखे लोग सामने वाले की नौकरी के प्रकार व स्तर अथवा व्यवसाय के बारे में पता करके लेवल निर्धारित करते है।

लेवल निर्धारित होने के पश्चात वे अपने आप को ऊपर या नीचे (subordinate) मानकर विचार विमर्श व डिस्कशन करते है।

आवश्यकता है कि वार्तालाप व व्यवहार में व्यक्ति के सोचने का तरीका, विचार, अनुभव, ज्ञान, जनसामान्य के कल्याण के लिए दृष्टिकोण महत्वपूर्ण होने चाहिए ना कि धर्म, जाति, समुदाय, नौकरी, व्यवसाय के आधार पर उसके लेवल के काॅर्डिनेटस्।

सादर
Raghuveer Prasad Meena

Tuesday, 1 November 2022

आदिवासियों को मेनस्ट्रीम में लाने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव।

rpmwu458 dt. 01.11.2022

आदिवासियों को महत्व देने, उनको मेनस्ट्रीम में लाने व उत्थान तथा कल्याण की विभिन्न योजनाओं के लिए सरकार को बहुत बहुत साधुवाद। आदिवासियों को मेनस्ट्रीम में लाने के लिए निम्नलिखित काम करने की जरूरत है -

1. आदिवासियों को उनके अधिकारों के प्रति जागृत करने के लिए विशेष कार्ययोजना बनाई जाये। इसी कड़ी में 9 अगस्त को विश्व आदिवासी अंतर्राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर केन्द्र व राज्य सरकार उपयुक्त कार्यक्रम आयोजित करवायें एवं इस दिन को राजकीय अवकाश घोषित करें।

1.1 आजतक किसी भी आदिवासी महानुभाव को भारतरत्न से सम्मानित नहीं किया गया है। योग्य आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, राजनेताओं व अन्य क्षेत्रों में विशेष योगदान देने वाले व्यक्तियों को भारतरत्न से सम्मानित किया जाना चाहिए। 

2. प्राकृतिक संसाधनों पर आदिवासियों के हक की नीति तय हो। आदिवासी क्षेत्र से निकाली जाने वाली प्राकृतिक सम्पदा में आदिवासियों की हिस्सेदारी हो।

3. विकास के नाम पर आदिवासियों की बेदखली पर नियंत्रण हो। विकास कार्य हेतु सोशल इम्पेक्ट ऑडिट हो एवं उसके पश्चात यदि बेदखली टाली नहीं जा सकती तो मुआवज़े की ठोस नीति बने व उसकी अनुपालना हो।

4. वन अधिकार अधिनियम 2006 के अंतर्गत वन भूमि पर स्वामित्व के अधिकार की अनुपालना एवं उसकी गहन मॉनिटरिंग ज़रुरी है।

5. आदिवासियों के संस्थागत विकास हेतु विशेष पैकेज के साथ कार्ययोजना बने व उसकी क्रियान्विति हो।

6. आदिवासी नेताओं, समाजसेवियों व स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को स्कूलों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये।

7. महत्वपूर्ण सार्वजनिक सम्पत्ति व रोडस् के नाम आदिवासी नेताओं, समाज सेवियों व महत्वपूर्ण व्यक्तियों के नाम पर रखे जाये।

8. देश की राजधानी व समस्त राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों की राजधानियों में आदिवासी विकास केंद्रों की स्थापना की जाये। इन केंद्रों में आधुनिक सुविधाओं के साथ ऑडिटोरियम, कांफ्रेंस हॉल, पुस्तकालय, शोध केन्द्र, होस्टल्स, गेस्ट हाउसेस एवं थियेटर बनाये जायें ताकि आदिवासियों की संस्कृति, खेल-कूद, परम्पराएँ एवं पुरा महत्व के दस्तावेज़ों का संरक्षण हो ताकि नई पीढ़ी आदिवासी धरोहरों से अवगत हो सके।

9. वर्ष 2011 के जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार देश में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या 8.62 % है जबकि आरक्षण 7.5 % ही है। अतः आवश्यकता है कि जनजाति आरक्षण वर्तमान जनसंख्या के अनुरूप 7.5 % से बढ़ाकर 8.62 % किया जाये।

10. राज्य सभा में आदिवासियों की जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व के लिए आरक्षण होना चाहिए।

11. सरकार के मंत्रियों में आदिवासियों को जनसंख्या के अनुसार उपयुक्त प्रतिनिधित्व मिले।

12. न्यायिक सेवाओं हेतु भारतीय न्यायिक सेवा का गठन हो ताकि न्यायिक सेवाओं में हर वर्ग का प्रतिनिधित्व हो सके। सर्वोच्च न्यायालय व उच्च न्यायालय के न्यायधीशों के चयन में आदिवासियों की जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व हेतु आरक्षण होना चाहिए।

13. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भारतीय प्रबंधन संस्थान एवं विश्वविद्यालयों एवं काॅलेजों की फैकल्टी में जनसंख्या के अनुसार आदिवासियों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए।

14. सरकार के महत्वपूर्ण पदों (की-पोस्टों) पर आदिवासी अधिकारियों को उनकी जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व मिले। ग्रुप ए तक की सभी सेवाओं में पदोन्नति में आरक्षण का प्रावधान हो एवं आयु सीमा हटाई जाये ताकि सभी स्तरों के पदों पर जनसंख्या के आधार पर समुचित प्रतिनिधित्व हो सके।

15. जिन-जिन विभागों में अनुसूचित जनजाति का बैकलाॅग है, उसे अविलम्ब भरा जाये।

16. व्यवसाय की ओर प्रेरित करने हेतु आदिवासियों को विशेष प्रकार के इंसेंटिव दिये जाये।

17. सरकार की नीतियों की वजह से सरकारी क्षेत्र कम होते जा रहे हैं व निजी क्षेत्र बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। अतः निजी क्षेत्र में भी आरक्षण का प्रावधान किया जाये।

18. आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य व शिक्षा पर विशेष कार्ययोजना होनी चाहिए। इन क्षेत्रों में पदस्थ किये जाने वाले अधिकारी व कर्मचारियों को विशेष इंसेंटिव दिया जाये ताकि कठिन परिस्थितियों में पदस्थ होने से परहेज नहीं हो।

19. अंधविश्वास व कुरीतियों को दूर करने हेतु विशेष कार्यक्रमों का आयोजन करवाया जाये एवं कार्यरत समाजसेवियों को विशेष प्रोत्साहन दिया जाये।

20. आदिवासियों से संबंधित पुस्तकों, लेखों व साहित्य को बढ़ावा देने हेतु विशेष कार्ययोजना बनाई जाये एवं उसकी क्रियान्विति सुनिश्चित कराएं।

21. आदिवासी क्षेत्रों में पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों की ज्यादतियाँ कम हो एवं आदिवासियों के उत्पीड़न के प्रकरणों पर तत्परता से ठोस कार्यवाही की जाये।

सादर
Raghuveer Prasad Meena

Thursday, 22 September 2022

Name & Surname

rpmwu457 dt. 22.09.2022

There is nothing in the Name but in our country there is a lot in Surname.
बड़ा दुर्भाग्य व शर्मसार है कि आजादी के 75 वर्ष पूर्ण होने के बावजूद भी आजादी के अमृत महोत्सव में हमारे देश में आज भी नाम के साथ लगे सरनेम के आधार पर डिस्क्रिमिनेशन होता है। शायद अनेकों नेताओं, अधिकारियों, कर्मचारियों व जनमानस ने इसे महसूस किया होगा। व्यक्ति का सरनेम तय करता है कि उसकी न्यायालयपूर्ण मांग की भी सुनवाई होगी अथवा नहीं। अत्याचार के विरोध में बहुत कम लोग साथ देते है।

देश के सेन्ट्रल विश्वविद्यालयों में आरक्षित वर्ग की टीचिंग फेकल्टी की भारी रिक्तियां है परन्तु उचित कार्यवाही की गति बहुत ही धीमी है। अनेकों प्रकरणों में NOT FOUND SUITABLE (NFS) के आधार पर रिक्तियों को नहीं भरा जाता है जबकि आज के दिनों में ऐसा हो सकना यथार्थ प्रतित नहीं होता है। 

राजस्थान में परीक्षा सम्पन्न होने के बाद आरक्षित वर्ग की रिक्तियों को कम कर दिया गया। अभ्यर्थी दर दर ठोकर खा रहे है परन्तु कोई प्रभावी सुनवाई नहीं हो रही है।

कृपया प्रण करे कि देश के किसी भी नागरिक के भी साथ सरनेम के आधार पर भेदभाव नहीं करेंगे। जिसके भी साथ अन्याय हो रहा हो, उसकी यथासंभव मदद करें।

सादर
Raghuveer Prasad Meena

Wednesday, 21 September 2022

Hypocrisy (दोगलापन, कपट, पाखंड)


rpmwu457 dt 21.09.2022
Hypocrisy : डिक्शनरी के मुताबिक हिपाॅक्रसि का अर्थ निम्नलिखित है - 
behaviour in which somebody pretends to have moral standards or opinions that he/she does not really have
(वास्‍तविकता के विपरीत) उच्‍च नैतिक मानदंड और व्‍यवहार का ढोंग रचना; पाखंड, ढोंग, मिथ्‍याचार। 

आमतौर पर हमारे देश में अधिकांशतः व्यक्तियों के व्यवहार में दोगलापन (hypocrisy) बहुत लम्बे अर्से से है। यहां तक कि भगवान मानने वालो ने भगवान को भी नहीं छोड़ा। कहने को कहते है कि कण कण में भगवान है परन्तु वर्ण व्यवस्था के अनुसार शूद्र वर्ण के नागरिकों में उनको कभी भगवान नहीं दिखाई दिया।

व्यक्ति सोचता कुछ है और कहता कुछ और है या कहता कुछ है और करता कुछ और ही है। व्यवहार की ऐसी विषमताएं हिपाॅक्रसि है। 

व्यक्ति के व्यवहार में हिपाॅक्रसि के माध्यम से दूसरों को मुर्ख बनाने के निम्नलिखित कारण हो सकते है - 
1. भय : व्यक्ति सही बात को कहने से विभिन्न कारणों से डरता हो।
2. लालच : कुछ खो नहीं जाये, इस बात का लालच। हो सकता है सही कहने से व्यक्ति नाराज होकर बात मानना बंद कर दे और वह नियंत्रण से निकल जाये।
3. यह भी हो सकता है कि सही बात इसलिए नहीं कह रहा हो कि सामने वाले को खराब महसूस नहीं होने देना चाहता हो।
4. मोरल वैल्यूज् के विरूद्ध बात करने से पब्लिक आॅपिनियन का डर हो।

देश की उन्नति व नागरिकों की आपस में सद्भावना में हिपाॅक्रसि एक प्रमुख प्रतिरोध है। अतः इसे समझना चाहिए और यथासंभव व्यवहार में नहीं अपनाये। जो लोग हिपाॅक्रेट है उनको पहचाने और उनकी बातों पर भरोसा नहीं करे। 

स्वयं ट्रांसपेरेंट रहने का प्रयास करें। सोच, कथनी व करनी में समरूपता रखें।

सादर 
रघुवीर प्रसाद मीना

Saturday, 17 September 2022

सामाजिक समरसता व सौहार्द

rpmwu456 dt.17.09.2022
विचारणीय सामाजिक समरसता व सौहार्दपूर्ण जीवनशैली अपनायें।

आजकल देखा जा रहा है कि व्यक्ति तार्किक तौर पर व्यक्त किये गये विचारों को जाति, धर्म, समुदाय विशेष के विरूद्ध मानकर बहुत जल्दी नाराज हो जा रहे है और प्रतिक्रिया में सामूहिक विरोध करना प्रारंभ कर देते है। ऐसा होने से सामाजिक समरसता व सौहार्द बिगड़ने लगा है।

कृपया निम्नलिखित पर विचार करें -
1. किसी भी व्यक्ति का जन्म उसके स्वयं के वश में नहीं है। उसका जन्म किसी भी जाति, धर्म या समुदाय में हो सकता है।

2. यदि दो बच्चों की जन्म के समय दूसरे धर्म, जाति या समुदाय में अदला-बदली हो जाये तो जब वे बड़े होंगे तो उनकी विचारधारा परवरिश के माहौल व रीति रिवाजों पर निर्भर करेगी ना कि उनके बायोलॉजिकल माँ बाप के जाति, धर्म या समुदाय के अनुरूप होगी। फिर विचारधारा में कट्टरता का मायना क्या है? 

3. हम सभी अपने-अपने व्यक्तिगत जीवन में सभी जाति, धर्म व समुदाय के लोगों की मदद लेते है और करते भी है। शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने दूसरे धर्म, जाति व समुदाय के व्यक्तियों से कभी भी मदद नहीं ली हो, तो इनके आधार पर भेदभाव व दुर्भावना का कितना औचित्य है? 

4. विचार करें कि हमारे जीवन के उपयोग या उपभोग में आने वाली अधिकांश चीजें आखिरकार वैज्ञानिक अनुसंधान की ही देन है। जो भी देश आज अग्रणी श्रेणी में है वे विज्ञान के कारण ही है। 

5. सरसरी नज़र से लगता तो ऐसा है कि धर्म मानवता के हित में है। धार्मिक व्यक्ति शिष्टाचारयुक्त व मानवीय गुणों से ओतप्रोत होगा। परन्तु धर्म के आधार पर एक दूसरे के साथ जो दरिंदगी व भेदभाव किये गये है या किये जाते है, वे बहुत ही अमानवीय है। यूरोप व अमेरिका में रंगभेद व भारत में छूआछूत के आधार पर एक ही धर्म के लोगों ने उनके ही धर्म के लोगों के साथ शारीरिक और मानसिक अत्याचार किये। यहां तक कि लोगों को पढ़ने तक नहीं दिया गया। कुछ लोग आज भी छुपे रूप से भेदभाव व अत्याचार करते है। 

6. जिन लोगों के साथ रंगभेद व छूआछूत के कारण पहले बहुत अधिक भेदभाव व अत्याचार हुआ, अब कालांतर में सामाजिक सोच, जागरूकता, रहन-सहन व तौर तरीके बदलने के कारण वे पढ़ने लिखने लगे गये और तार्किक बाते करने लगे है। ईमानदार सोच वाले समझदार लोग उनका पक्ष लेते है, तत्थात्मक विचार प्रकट करते है और शोषितों का मनोबल बढ़ाते है। परन्तु दकियानूसी सोच वाले एवं जिन लोगों के स्वार्थ पर चोट पडती है वे लोग उनकी बातों का बुरा मानते है और होहल्ला करने लग जाते है। हालांकि जागृति की ज्योति बुझ नहीं पायेगी। उनका विरोध आग में घी का काम करेगा। 

अत: लोगों के साथ लम्बे समय तक हुए अत्याचार की पीड़ा को समझते हुए बेवजह धर्म, जाति और समुदाय के आधार पर सामाजिक समरसता व सौहार्द को खराब नहीं करे।

सादर 
रघुवीर प्रसाद मीना 

Sunday, 4 September 2022

आदिवासियों को किस दिशा में चलना होगा?

rpmwu455 dt 04.09.2022

आदिवासियो_की_उन्नति_की_दिशा
विचारणीय सामाजिक कार्यकर्ता आदिवासियों व ˈमार्जिनलाइज़्ड नागरिकों के अधिकारों व हितों की रक्षा के लिए अथक प्रयास करते है। वे चाहते कि हाशिये पर खड़े देश के नागरिक मुख्य धारा में शामिल हो। ये उनके की प्रयास है जिसके कारण आदिवासियों व उनके समान पिछड़े अन्य नागरिकों के कल्याण के लिए कानून बनते है एवं अग्रणी नागरिकों के मन में उनके उत्थान के लिए सद्भावना विकसित होती है। अतः सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा आदिवासियों व पंक्ति के अंतिम छोर पर बैठे नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने का हर प्रयास साधुवाद से औतप्रोत समझा जाये।

दूसरी ओर हम सभी को विचार करना होगा कि डैम इत्यादि बनाकर देश की प्राकृतिक संपदा के सदुपयोग से देश की उन्नति करना भी आवश्यक है। बड़े प्रोजेक्ट्स में आदिवासियों का विस्थापन एक बड़ी चुनौती है। सरकार व आदिवासियों दोनों को ही जीत-जीत (win-win) की स्थिति बनाने का प्रयास करना चाहिए।

सरकार को चाहिए कि प्रथम तो आदिवासियों को न्यूनतम विस्थापित करे और जिनका विस्थापन अपरिहार्य है उन्हें पूरा मुआवजा बिना किसी बाधा के मिल जाये। आदिवासियों के मन में जगह विशेष से लगाव रहता है अतः उनके द्वारा किये गये छोटे मोटे प्रतिरोध को नजरअंदाज कर दिया जाये। नये विस्थापित स्थान पर आवास, परिवहन, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, सामाजिक जीवन से जुड़ी यथासंभव बेहतर से बेहतर सुविधाएं निशुल्क मुहैया कराई जाये। आदिवासियों को भूमि व अन्य संसाधनों  के अधिकार दिये जाये।

आदिवासी आदिवासियों को भी उन्नति करने व मुख्य धारा में आने के लिए स्वयं की सोच में बदलाव करने की सख्त जरूरत है। केवल जल_जंगल_जमीन की बाते करने से उन्नति नहीं होने वाली है। मेरे मतानुसार आदिवासियों को निम्नलिखित दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता है -

1. आदिवासियों को चाहिए कि वे मन में अपने आप को बड़ा समझे और पहचाने कि वे जहां रह रहे है वह स्थान सदियों से उनके पुर्बजो का रहा है। वर्तमान युग में आर्थिक रूप से पिछड़ जाने से मन में किसी प्रकार की हीन भावना नहीं आने दे। आदिवासी किसी भी तरह हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था का हिस्सा नहीं रहे है। आदिवासी संस्कृति में सभी लोग समान है। कोई ऊंच नीच नहीं है। आदिवासी हमेशा खुद्दार, बहादुर, न्यायप्रिय व दूसरों के काम आने वाले लोग रहे है। आदिवासियों ने दुसरों को ज्यादा दिया है लिया बहुत कम है।

2. आदिवासियों को स्वयं जानना होगा कि आखिर वे उनकी ही जमीन पर दूसरों से पीछे कैसे रह गये? क्या कारण व कमियां रही है जिनसे वे अंतिम छोर पर पहुंच गए है? उन्नति का मतलब क्या है? सही मंजिल क्या है? कैसे आगे बढ़े? किसका साथ ले?

3. सबसे प्रथम आदिवासियों को उनकी दुर्दशा के कारणों को पहचानना होगा, जो कि निम्न प्रकार है -
3.1 आदिवासियों का साधा व संतुष्टिपूर्ण जीवन-पद्धति व दूसरों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना।
3.2 वैज्ञानिक दृष्टिकोण से दूर रहना व अंधविश्वासी होना।
3.3 नशे की लत व उसे सामाजिक मान्यता प्रदान करना। 
3.4 अशिक्षा व शिक्षा की सुविधाएं नहीं होना। 
3.5 स्वास्थ्य की सुविधाएं मुहैया नहीं होना।
3.6 जंगलों की भूमि के अधिकार नहीं होना।
3.7 मुख्य धारा में जाने की सोचने की बजाय वर्तमान दुखद स्थिति में संतुष्ट रहना।
3.8 घर से दूर जाने में हिचकना।
3.9 ब्याज व शोषण कर्ताओं के चुंगल में फंसना।
3.10 किसी भी राज, पार्टी, व्यक्ति के लिए जरूरत से ज्यादा निष्ठावान (loyal) होना। निष्ठा छोड़ने में देरी करना।
3.11 रहने के क्षेत्र में यातायात के संसाधनों की कमी होना।
3.12 आदिवासी राजनेताओं की ज्यादा चलती नहीं है। वे उनके समाज के लोगों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की क्रियान्विति नहीं करवा पाते है।
3.13 पढ़े लिखे आदिवासी अधिकारी अपने परिवार तक सीमिट कर रह जाते है। दूसरों के उत्थान के लिए कम लोग ही काम करते है।
3.14 राज में हिस्सेदारी के लिए प्रयास नहीं करना।
3.15 राजनीतिक समझ में कमी। राजनीति की बातों से मुंह मोड़ना। 
3.16 मुख्य रूप से पारम्परिक खेती पर निर्भर होना। बिजनेस में लगभग नगण्य हिस्सेदारी है। सामाजिक तौर पर भी प्रोत्साहन नहीं है।
3.17 विभिन्न क्षेत्रों के आदिवासियों में आपसी मेलजोल की कमी है। विचारों का आदान-प्रदान नहीं होता है।
3.18 धर्म, संस्कृति, नाचगान व इतिहास की बातों पर जरूरत से ज्यादा समय व संसाधन खर्च करना।
3.19 सरकार की जनजाति कल्याणकारी योजनाओं का सही क्रियान्वयन नहीं होना।
3.20 संविधान के शैड्यूल 5 व 6 के प्रावधानों का सही रूप में लागू नहीं होना।
3.21 हिल व दूर दराज के कठिन जगहों पर निवास करना।
3.22 जबरन विस्थापन व मुआवजा नहीं मिलना।
3.23 फोरेस्ट राइट्स एक्ट 2006 की सही तरह से अनुपालना नहीं होना। 

4. उक्त क्रमांक 3 पर सूचि बद्ध बिन्दुओं के अलावा भी कई अनेक कारण है जिनकी वजह से आदिवासी पिछड़े हुए है। अब अहम बात यह है कि समाधान क्या है? उक्त प्रत्येक बिन्दु पर आदिवासियों के युवाओं को स्वयं समझना होगा और सुधारात्मक कदम उठाने होंगे। नाज गान, पुराने रीति-रिवाजों व संस्कृति पर बने रहने से काम नहीं चलने वाला है। उन्हें उनके हित के लिए बदलना होगा। असंतुष्ट बनना होगा। किसी के लिए भी अंधी निष्ठा नहीं होनी चाहिए। तय करें कि एक दिन देश के सभी आदिवासी मुख्य धारा का हिस्सा बने।

#आदिवासियोंकोउनकेसोचनेकेतरीकेमेंबदलावकरनाहोगाऔरमुख्यधारामेंआनाहीचाहिये।

कृपया इस विषय पर आपके विचारों से भी अवगत कराये। 

सादर
Raghuveer Prasad Meena

वैल्यू (Value)

rpmwu454 Dt. 04.09.2022

हर व्यक्ति को वैल्यू को समझना बहुत जरूरी है। आखिर चीजों व जीवन के विभिन्न पहलुओं की वैल्यू का मतलब क्या है? इसे साधारण निम्नलिखित उदाहरणों से आसानी से समझा जा सकता है -

1. पैन की वैल्यू है कि वह लिखे। पेन चाहे कितना भी सुन्दर हो या किसी भी चीज का बना हो या किसी ने भी बनाया हो यदि वह लिख नहीं सकता है तो पेन के रूप में उसकी कोई वैल्यू नहीं है।

2. भैंस की वैल्यू है कि वह दूध दे। परन्तु यदि वह कभी भी दूध ही नहीं दे तो चाहे उसके सींग कितने अच्छे हो या पूंछ लम्बी हो या शरीर सुडोल हो तो उसकी भैंस से अपेक्षित वैल्यू नहीं है।

3. इंटेरनेट कनेक्शन की वैल्यू है कि वह आपके मोबाइल, लैपटॉप या कम्प्यूटर पर डेटा अपलोड या डाउनलोड करें। परन्तु यदि वह ऐसा नहीं करता है तो चाहे किसी भी कम्पनी का हो उसकी कोई वैल्यू नहीं है।

4. राजनेता की वैल्यू है कि वह नागरिकों के कल्याण व उन्नति के मुद्दों की पहल व वकालत करे। यदि पार्टी के टिकट या पद की लालच या किसी डर से ऐसा नहीं करे और चुप रहे तो ऐसे राजनेताओं की कोई वैल्यू नहीं है चाहे वे किसी भी विचारधारा या जाति या धर्म से सम्बंध रखते हो।

5. पुलिस की वैल्यू है कि वह नागरिकों को सुरक्षा मुहैया कराये। यदि वह ऐसा नहीं करती है तो चाहे पुलिस वाले कितने हष्ट-पुष्ट हो, माडर्न हथियार व संसाधनों से युक्त हो, अच्छी बाते करते हो, उनकी कोई वैल्यू नहीं है।

6. माननीय न्यायालयों की वैल्यू है कि वे नागरिकों को न्याय प्रदान करे ताकि देश में कानून का सम्मान हो, कोई भी नागरिक बेवजह अत्याचार का शिकार नहीं हो। यदि ऐसा नहीं हो तो न्यायालय की वैल्यू कम होना स्वाभाविक है।

7. सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों की वैल्यू है कि वे उनकी जिम्मेदारियों का सही निर्वहन करे ताकि नागरिकों को सहुलियत मिले। जो ऐसा नहीं करते है तो उनकी कोई वैल्यू नहीं है। 

8. स्टूडेंट की वैल्यू है कि वह पढ़े और ज्ञानार्जन करें। यदि वह पढ़ने की उम्र में ऐसा नहीं करता है और दूसरी चीजों में व्यस्त रहता है तो ऐसे स्टूडेंट की कोई वैल्यू नहीं है। 

वैल्यू के कांसेप्ट को समझने के लिए उक्त तो कुछ ही उदाहरण है। जिनसे  एकदम स्पष्ट है कि चीजों की वैल्यू का क्या तात्पर्य है। और  अनेक उदाहरण हो सकते है। 

अब विचार करें कि हमारे स्वयं व दूसरों से भी जीवन के विभिन्न पहलुओं में वैल्यू अपेक्षित रहती है। हर सामाजिक सम्बन्ध में वैल्यू अपेक्षित होती है। पिता, माँ, पुत्र, पुत्री, मित्र, पति, पत्नि, भाई, बहन, रिश्तेदार, मित्र, जानकर के रूप में व अनजान के लिए मानवीय गुणों के आधार पर वैल्यू अपेक्षित रहती है। इसी प्रकार इम्प्लोयर व इम्प्लोयी से वैल्यू अपेक्षित होती है। नेता व जनता से एक दूसरे के लिए वैल्यू अपेक्षित होती है।

हर व्यक्ति को उसकी विभिन्न भूमिकाओं  में अपेक्षित वैल्यू का स्वयं को ध्यान रखने की जरूरत है। अपेक्षा करने वालो को भी चाहिए कि बेवजह बिना वैल्यू वाले लोगों या चीजों को अनावश्यक लम्बे समय तक ढोये नहीं। जो पेन लिख नहीं सकते है उन्हें त्यागना बेहतर है। यह तार्किक तथ्य राजनेताओं सहित सभी के लिए लागू है।

सादर
Raghuveer Prasad Meena